Saturday, September 27, 2014

भिन्डी

एक राजा था उसके महल में एक नया खानसामा ( खाना बनाने वाला ) आया जो बहुत ही चतुर व्यक्ति था और भोजन बहुत लज़ीज़ बनाता था ! उस खानसामे को पता था की राजा की पसंदीदा सब्ज़ी भिन्डी है ! उसने इसीलिए रात के भोजन में भिन्डी बनाई ! जब राजा ने देखा की भिन्डी बनाई गयी है राजा खुश हो गया और चूँकि भिन्डी स्वादिष्ट थी तो भिन्डी खा कर तो और भी गदगद हो गया ! राजा ने खानसामे से खुश होते हुए कहा की : मज़ा आ गया आज तो भिन्डी खा कर भिन्डी क्या ज़बरदस्त सब्ज़ी होती है वाह ! इस पर खानसामा बोला अरे साहब भिन्डी का तो कोई जवाब ही नहीं मैं तो कहता हूँ की सब्ज़ियों की रानी है भिन्डी, भिन्डी जैसी कोई सब्ज़ी नहीं ! राजा और भी खुश हुआ और अपने गले से हीरे की माला निकाल कर उस खानसामे को दी और कहा ये लो तुम्हारा इनाम ! अगले दिन दोपहर का भोजन करने जैसे ही राजा बैठा उसने देखा की खानसामे ने फिर भिन्डी बना दी लेकिन अब राजा ने भिन्डी की इतनी तारीफ कर दी थी उसे मना करते नहीं बना और उसे फिर भिन्डी की तारीफ करना पड़ी और खाना पड़ी और खानसामे ने भी भिन्डी की तारीफ की और राजा ने फिर अपने गले से माला निकाल कर खानसामे को दे दी ! अब बारी थी रात के भोजन की रात के भोजन में फिरसे खानसामे ने भिन्डी बना दी राजा लगातार 2 दिनो से भिन्डी खाके उक्ता चुका था उसने लेकिन उसने जैसे तैसे मन मार के भिन्डी खा ली और चुपचाप एक माला गले से निकाल कर खानसामे को दे दी ! अब अगले दिन जब फिर भोजन करने बैठा राजा उसे फिर भिन्डी नज़र आ गयी ! राजा आग बबूला हो गया भिन्डी देख कर और बोला क्या वाहियात सब्ज़ी होती है भिन्डी क्यों बना दी किसने कहा तुम्हे भिन्डी बनाने को !! खानसामा विनम्रतापूर्वक बोला की साहब भिन्डी तो निहायती घटिया सब्ज़ी होती है मैं तो कहता हूँ की किसी बेवक़ूफ़ को ही पसंद होगी भिन्डी, पता नहीं कैसे खा लेते है लोग भिन्डी !! राजा का ये सुनते ही और भी दिमाग खराब हो गया और वो चिल्लाता हुआ बोला अरे नामाकूल कल तक जब तक मैं भिन्डी की तारीफ कर रहा था तू भी भिन्डी की तारीफ कर रहा था और अब जब मैं भिन्डी की बुराई करने लगा तो तू भी भिन्डी की बुराई करने लगा बड़ा होशियार है तू !! इस पर खानसामा मुस्कुराता हुआ बोला : साहब मैं आपका नौकर हूँ भिन्डी का नहीं !!


जय बाबा बनारस .....

भिन्डी

एक राजा था उसके महल में एक नया खानसामा ( खाना बनाने वाला ) आया जो बहुत ही चतुर व्यक्ति था और भोजन बहुत लज़ीज़ बनाता था ! उस खानसामे को पता था की राजा की पसंदीदा सब्ज़ी भिन्डी है ! उसने इसीलिए रात के भोजन में भिन्डी बनाई ! जब राजा ने देखा की भिन्डी बनाई गयी है राजा खुश हो गया और चूँकि भिन्डी स्वादिष्ट थी तो भिन्डी खा कर तो और भी गदगद हो गया ! राजा ने खानसामे से खुश होते हुए कहा की : मज़ा आ गया आज तो भिन्डी खा कर भिन्डी क्या ज़बरदस्त सब्ज़ी होती है वाह ! इस पर खानसामा बोला अरे साहब भिन्डी का तो कोई जवाब ही नहीं मैं तो कहता हूँ की सब्ज़ियों की रानी है भिन्डी, भिन्डी जैसी कोई सब्ज़ी नहीं ! राजा और भी खुश हुआ और अपने गले से हीरे की माला निकाल कर उस खानसामे को दी और कहा ये लो तुम्हारा इनाम ! अगले दिन दोपहर का भोजन करने जैसे ही राजा बैठा उसने देखा की खानसामे ने फिर भिन्डी बना दी लेकिन अब राजा ने भिन्डी की इतनी तारीफ कर दी थी उसे मना करते नहीं बना और उसे फिर भिन्डी की तारीफ करना पड़ी और खाना पड़ी और खानसामे ने भी भिन्डी की तारीफ की और राजा ने फिर अपने गले से माला निकाल कर खानसामे को दे दी ! अब बारी थी रात के भोजन की रात के भोजन में फिरसे खानसामे ने भिन्डी बना दी राजा लगातार 2 दिनो से भिन्डी खाके उक्ता चुका था उसने लेकिन उसने जैसे तैसे मन मार के भिन्डी खा ली और चुपचाप एक माला गले से निकाल कर खानसामे को दे दी ! अब अगले दिन जब फिर भोजन करने बैठा राजा उसे फिर भिन्डी नज़र आ गयी ! राजा आग बबूला हो गया भिन्डी देख कर और बोला क्या वाहियात सब्ज़ी होती है भिन्डी क्यों बना दी किसने कहा तुम्हे भिन्डी बनाने को !! खानसामा विनम्रतापूर्वक बोला की साहब भिन्डी तो निहायती घटिया सब्ज़ी होती है मैं तो कहता हूँ की किसी बेवक़ूफ़ को ही पसंद होगी भिन्डी, पता नहीं कैसे खा लेते है लोग भिन्डी !! राजा का ये सुनते ही और भी दिमाग खराब हो गया और वो चिल्लाता हुआ बोला अरे नामाकूल कल तक जब तक मैं भिन्डी की तारीफ कर रहा था तू भी भिन्डी की तारीफ कर रहा था और अब जब मैं भिन्डी की बुराई करने लगा तो तू भी भिन्डी की बुराई करने लगा बड़ा होशियार है तू !! इस पर खानसामा मुस्कुराता हुआ बोला : साहब मैं आपका नौकर हूँ भिन्डी का नहीं !!


जय बाबा बनारस .....

भिन्डी

एक राजा था उसके महल में एक नया खानसामा ( खाना बनाने वाला ) आया जो बहुत ही चतुर व्यक्ति था और भोजन बहुत लज़ीज़ बनाता था ! उस खानसामे को पता था की राजा की पसंदीदा सब्ज़ी भिन्डी है ! उसने इसीलिए रात के भोजन में भिन्डी बनाई ! जब राजा ने देखा की भिन्डी बनाई गयी है राजा खुश हो गया और चूँकि भिन्डी स्वादिष्ट थी तो भिन्डी खा कर तो और भी गदगद हो गया ! राजा ने खानसामे से खुश होते हुए कहा की : मज़ा आ गया आज तो भिन्डी खा कर भिन्डी क्या ज़बरदस्त सब्ज़ी होती है वाह ! इस पर खानसामा बोला अरे साहब भिन्डी का तो कोई जवाब ही नहीं मैं तो कहता हूँ की सब्ज़ियों की रानी है भिन्डी, भिन्डी जैसी कोई सब्ज़ी नहीं ! राजा और भी खुश हुआ और अपने गले से हीरे की माला निकाल कर उस खानसामे को दी और कहा ये लो तुम्हारा इनाम ! अगले दिन दोपहर का भोजन करने जैसे ही राजा बैठा उसने देखा की खानसामे ने फिर भिन्डी बना दी लेकिन अब राजा ने भिन्डी की इतनी तारीफ कर दी थी उसे मना करते नहीं बना और उसे फिर भिन्डी की तारीफ करना पड़ी और खाना पड़ी और खानसामे ने भी भिन्डी की तारीफ की और राजा ने फिर अपने गले से माला निकाल कर खानसामे को दे दी ! अब बारी थी रात के भोजन की रात के भोजन में फिरसे खानसामे ने भिन्डी बना दी राजा लगातार 2 दिनो से भिन्डी खाके उक्ता चुका था उसने लेकिन उसने जैसे तैसे मन मार के भिन्डी खा ली और चुपचाप एक माला गले से निकाल कर खानसामे को दे दी ! अब अगले दिन जब फिर भोजन करने बैठा राजा उसे फिर भिन्डी नज़र आ गयी ! राजा आग बबूला हो गया भिन्डी देख कर और बोला क्या वाहियात सब्ज़ी होती है भिन्डी क्यों बना दी किसने कहा तुम्हे भिन्डी बनाने को !! खानसामा विनम्रतापूर्वक बोला की साहब भिन्डी तो निहायती घटिया सब्ज़ी होती है मैं तो कहता हूँ की किसी बेवक़ूफ़ को ही पसंद होगी भिन्डी, पता नहीं कैसे खा लेते है लोग भिन्डी !! राजा का ये सुनते ही और भी दिमाग खराब हो गया और वो चिल्लाता हुआ बोला अरे नामाकूल कल तक जब तक मैं भिन्डी की तारीफ कर रहा था तू भी भिन्डी की तारीफ कर रहा था और अब जब मैं भिन्डी की बुराई करने लगा तो तू भी भिन्डी की बुराई करने लगा बड़ा होशियार है तू !! इस पर खानसामा मुस्कुराता हुआ बोला : साहब मैं आपका नौकर हूँ भिन्डी का नहीं !!


जय बाबा बनारस .....

भिन्डी

एक राजा था उसके महल में एक नया खानसामा ( खाना बनाने वाला ) आया जो बहुत ही चतुर व्यक्ति था और भोजन बहुत लज़ीज़ बनाता था ! उस खानसामे को पता था की राजा की पसंदीदा सब्ज़ी भिन्डी है ! उसने इसीलिए रात के भोजन में भिन्डी बनाई ! जब राजा ने देखा की भिन्डी बनाई गयी है राजा खुश हो गया और चूँकि भिन्डी स्वादिष्ट थी तो भिन्डी खा कर तो और भी गदगद हो गया ! राजा ने खानसामे से खुश होते हुए कहा की : मज़ा आ गया आज तो भिन्डी खा कर भिन्डी क्या ज़बरदस्त सब्ज़ी होती है वाह ! इस पर खानसामा बोला अरे साहब भिन्डी का तो कोई जवाब ही नहीं मैं तो कहता हूँ की सब्ज़ियों की रानी है भिन्डी, भिन्डी जैसी कोई सब्ज़ी नहीं ! राजा और भी खुश हुआ और अपने गले से हीरे की माला निकाल कर उस खानसामे को दी और कहा ये लो तुम्हारा इनाम ! अगले दिन दोपहर का भोजन करने जैसे ही राजा बैठा उसने देखा की खानसामे ने फिर भिन्डी बना दी लेकिन अब राजा ने भिन्डी की इतनी तारीफ कर दी थी उसे मना करते नहीं बना और उसे फिर भिन्डी की तारीफ करना पड़ी और खाना पड़ी और खानसामे ने भी भिन्डी की तारीफ की और राजा ने फिर अपने गले से माला निकाल कर खानसामे को दे दी ! अब बारी थी रात के भोजन की रात के भोजन में फिरसे खानसामे ने भिन्डी बना दी राजा लगातार 2 दिनो से भिन्डी खाके उक्ता चुका था उसने लेकिन उसने जैसे तैसे मन मार के भिन्डी खा ली और चुपचाप एक माला गले से निकाल कर खानसामे को दे दी ! अब अगले दिन जब फिर भोजन करने बैठा राजा उसे फिर भिन्डी नज़र आ गयी ! राजा आग बबूला हो गया भिन्डी देख कर और बोला क्या वाहियात सब्ज़ी होती है भिन्डी क्यों बना दी किसने कहा तुम्हे भिन्डी बनाने को !! खानसामा विनम्रतापूर्वक बोला की साहब भिन्डी तो निहायती घटिया सब्ज़ी होती है मैं तो कहता हूँ की किसी बेवक़ूफ़ को ही पसंद होगी भिन्डी, पता नहीं कैसे खा लेते है लोग भिन्डी !! राजा का ये सुनते ही और भी दिमाग खराब हो गया और वो चिल्लाता हुआ बोला अरे नामाकूल कल तक जब तक मैं भिन्डी की तारीफ कर रहा था तू भी भिन्डी की तारीफ कर रहा था और अब जब मैं भिन्डी की बुराई करने लगा तो तू भी भिन्डी की बुराई करने लगा बड़ा होशियार है तू !! इस पर खानसामा मुस्कुराता हुआ बोला : साहब मैं आपका नौकर हूँ भिन्डी का नहीं !!


जय बाबा बनारस .....

Saturday, September 20, 2014

एक कहानी झुण्ड....

विवेकानंद ने एक कहानी का जिक्र कई बार किया है | 
एक शेर का बच्चा अपने झुण्ड से बिछुड जाता है और भेंड़ों के झुण्ड में जा मिलता है | उसका लालन
पालन भेंड़ों की तरह होता है और उसमे भेंड के सारे गुण आ जातें हैं | एक दिन उस भेंड़ों के झुण्ड पर
एक शेर आक्रमण कर देता है सारे भेंड अपनी जान ले कर भागतें हैं | शेर का बच्चा भी भागता है |शेर
को यह सब देख कर मारे आश्चर्य की उसकी आँखें फटी रह जाती है | वह भेंड़ों को छोड़ कर पहले
शेर के बच्चे को पहले दबोचता है | शेर का बच्चा मिमियाने लगता है |शेर उस बच्चे से पूछता है की भेंड तो भाग गए कोई बात नहीं लेकिन तुम क्यों भाग रहे हो ?
शेर का बच्चा मिमियाने लगता है | शेर को बात समझ में आ जाती है ,पास हीं नदी बह रही होती है | शेर उस बच्चे का गर्दन पकड कर नदी में उसका छवि दिखाता है | शेर का बच्चा अपने को पहचान कर जोरदार गर्जन करता है | शेर को मारे खुशी के आंसू छलक आतें हैं |हम भटके हुए शेर के बच्चे हैं समय समय पर कोई कृष्ण अपने गीता के माध्यम से ये बताता है कि हम शेर हैं और खुद को भेंड समझ बैठे हैं और जब हम खुद को पहचानतें हैं तो जितनी खुशी हमें होती है
वर्तमान में भारत की जो दुर्दशा यहाँ के भ्रष्टों ने ,आततायिओं ने बना रखी है ऐसे में हमें अपने शेर होने का परिचय देना हीं होगा | हम शेर बन कर भ्रष्टों के गले दबोचे और एक एक चीज का हिसाब मांगे | हम शेर हैं और शेर की तरह जियें | हमारे नस नस में रक्त की ज्वाला बह रही है | हम ऊर्जा और शक्ति के श्रोत हैं | हम ईश्वरपुत्र हैं ऐसे भाव के साथ जियें |



Tuesday, August 19, 2014

शिखा का त्याग करना मानो अपने कल्याणका त्याग करना हैं।

हिन्दू धर्म का छोटे से छोटा सिध्दांत,छोटी-से-छोटी बात भी अपनी जगह पूर्ण और कल्याणकारी हैं। छोटी सी शिखा अर्थात् चोटी भी कल्याण,विकास का साधन बनकर अपनी पूर्णता व आवश्यकता को दर्शाती हैं। शिखा का त्याग करना मानो अपने कल्याणका त्याग करना हैं। जैसे घङी के छोटे पुर्जे की जगह बडा पुर्जा काम नहीं कर सकता क्योंकि भले वह छोटा हैं परन्तु उसकी अपनी महत्ता हैं, ऐसे ही शिखा की भी अपनी महत्ता हैं। शिखा न रखने से हम जिस लाभ से वंचित रह जाते हैं, उसकी पूर्ति अन्यकिसी साधन से नहीं हो सकती।
'हरिवंश पुराण' में एक कथा आती हैं। हैहय व तालजंघ वंश के राजाओं ने शक, यवन, काम्बोज पारद आदि राजाओं को साथ लेकर राजा बाहू का राज्य छीन लिया। राजा बाहु अपनी पत्नी के साथ वन में चला गया। वहाँ राजा की मृत्यु हो गयी। महर्षिऔर्व ने उसकी गर्भवती पत्नी की रक्षा की और उसे अपने आश्रम में ले आये। वहाँ उसने एक पुत्र को जन्म दिया, जो आगे चलकर राजा सगर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। राजा सगर ने महर्षि और्व से शस्त्र और शास्त्र विद्या सीखीं। समय पाकर राजा सगरने हैहयों को मार डाला और फिर शक, यवन, काम्बोज, पारद, आदि राजाओं को भी मारने का निश्चय किया। ये शक, यवन आदि राजा महर्षि वसिष्ठ की शरण में चले गये। महर्षि वसिष्ठ ने उन्हें कुछ शर्तों पर उन्हें अभयदान दे दिया। और सगर कोआज्ञा दी कि वे उनको न मारे। राजा सगर अपनी प्रतिज्ञा भी नहीं छोङ सकते थे और महर्षि वसिष्ठ जी की आज्ञा भी नहीं टाल सकते थे। अत: उन्होंने उन राजाओं का सिर शिखासहित मुँडवाकर उनकों छोङ दिया।
प्राचीन काल में किसीकी शिखा काट देना मृत्युदण्ड के समान माना जाता था। बङे दुख की बात हैं कि आज हिन्दु लोग अपने हाथों से अपनी शिखा काट रहे है। यह गुलामी की पहचान हैं। शिखा हिन्दुत्व की पहचान हैं। यह आपके धर्म और संस्कृतिकी रक्षक हैं। शिखा के विशेष महत्व के कारण ही हिन्दुओं ने यवन शासन के दौरान अपनी शिखा की रक्षा के लिए सिर कटवा दिये पर शिखा नहीं कटवायी।

डा॰ हाय्वमन कहते है -''मैने कई वर्ष भारत मे रहकर भारतीय संस्कृति क अध्ययन किया हैं ,यहाँ के निवासी बहुत काल से चोटी रखते हैं , जिसका वर्णन वेदों में भी मिलता हैं। दक्षिण में तो आधे सिर पर 'गोखुर' के समान चोटी रखते हैं ।उनकी बुध्दि की विलक्षणता देखकर मैं अत्यंत प्रभावित हुआ हुँ। अवश्य ही बौध्दिक विकास में चोटी बङी सहायता देती हैं । सिर पर चोटी रखना बढा लाभदायक हैं । मेरा तो हिन्दु धर्म में अगाध विश्वास हैं और मैं चोटी रखने का कायल हो गया हूँ । "
प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा॰ आई॰ ई क्लार्क एम॰ डी ने कहा हैं " मैंने जबसे इस विज्ञान की खोज की हैं तब से मुझे विश्वास हो गया हैं कि हिन्दुओं का हर एक नियम विज्ञान से परिपूर्ण हैं। चोटी रखना हिन्दू धर्म ही नहीं , सुषुम्ना के केद्रों की रक्षा केलिये ऋषि-मुनियों की खोज का विलक्षण चमत्कार हैं।"
इसी प्रकार पाश्चात्य विद्वान मि॰ अर्ल थामस लिखते हैं की "सुषुम्ना की रक्षा हिन्दु लोग चोटी रखकर करते हैं जब्की अन्य देशों में लोग सिर पर लम्बे बाल रखकर या हैट पहनकर करते हैं। इन सब में चोटी रखना सबसे लाभकारी हैं। किसी भीप्रकार से सुषुम्ना की रक्षा करना जरुरी हैं।"
वास्तव में मानव-शरीर को प्रकृति ने इतना सबल बनाया हैं की वह बङे से बङे आघात को भी सहन करके रह जाता हैं परन्तु शरीर में कुछ ऐसे भी स्थान हैं जिन पर आघात होने से मनुष्य की तत्काल मृत्यु हो सकती हैं। इन्हें मर्म-स्थान कहाजाता हैं। शिखा के अधोभाग में भी मर्म-स्थान होता हैं, जिसके लिये सुश्रुताचार्य ने लिखा हैं
मस्तकाभ्यन्तरो परिष्टात् शिरा सन्धि सन्निपातों ।
रोमावर्तोऽधिपतिस्तत्रपि सधो मरण्म् ।
अर्थात् मस्तक के भीतर ऊपर जहाँ बालों का आवर्त(भँवर) होता हैं, वहाँ संपूर्ण नाङियों व संधियों का मेल हैं, उसे 'अधिपतिमर्म' कहा जाता हैं।यहाँ चोट लगने से तत्काल मृत्यु हो जाती हैं
(सुश्रुत संहिता शारीरस्थानम् : ६.२८)
सुषुम्ना के मूल स्थान को 'मस्तुलिंग' कहते हैं। मस्तिष्क के साथ ज्ञानेन्द्रियों - कान, नाक, जीभ, आँख आदि का संबंध हैं और कामेन्द्रियों - हाथ, पैर,गुदा,इन्द्रिय आदि का संबंध मस्तुलिंग से हैं मस्तिष्क व मस्तुलिंग जितने सामर्थ्यवान होते हैं उतनीही ज्ञानेन्द्रियों और कामेन्द्रियों - की शक्ति बढती हैं। मस्तिष्क ठंडक चाहता हैं और मस्तुलिंग गर्मी मस्तिष्क को ठंडक पहुँचाने के लिये क्षौर कर्म करवाना और मस्तुलिंग को गर्मी पहुँचाने के लिये गोखुर के परिमाण के बाल रखना आवश्यक होता हैं ।बाल कुचालक हैं, अत: चोटी के लम्बे बाल बाहर की अनावश्यक गर्मी या ठंडक से मस्तुलिंग की रक्षा करते हैं
शिखा रखने के अन्य निम्न लाभ बताये गये हैं -
१॰ शिखा रखने तथा इसके नियमों का यथावत् पालन करने से सद्‌बुद्धि , सद्‌विचारादि की प्राप्ति होती हैं।
२॰ आत्मशक्ति प्रबल बनती हैं।
३॰मनुष्य धार्मिक , सात्विक व संयमी बना रहता हैं।
४॰लौकिक - पारलौकिक कार्यों मे सफलता मिलती हैं।
५॰सभी देवी देवता मनुष्य की रक्षा करते हैं।
६॰सुषुम्ना रक्षा से मनुष्य स्वस्थ,बलिष्ठ ,तेजस्वी और दीर्घायु होता हैं।
७नेत्र्ज्योति सुरक्षित रहती हैं।
इस प्रकार धार्मिक,सांस्कृतिक,वैज्ञानिक सभी द्रष्टियों से शिखा की महत्ता स्पष्ट होती हैं। परंतु आज हिन्दू लोग पाश्चात्यों के चक्कर में पङकर फैशनेबल दिखने की होङ में शिखा नहीं रखते व अपने ही हाथों अपनी संस्कृति का त्याग कर डालते हैं।लोग हँसी उङाये, पागल कहे तो सब सह लो पर धर्म का त्याग मत करो। मनुष्य मात्र का कल्याण चाहने वाली अपनी हिन्दू संस्कृति नष्ट हो रही हैं। हिन्दु स्वयं ही अपनी संस्कृति का नाश करेगा तो रक्षा कौन करेगा।

Thursday, June 19, 2014

धर्म हिंसा तथैव च: ।। धर्म एव हतो हंति धर्मो रक्षति रक्षित:।।

।। अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च: ।। धर्म एव हतो हंति धर्मो रक्षति रक्षित:।।









jai baba banaras...