बचपन के निस्वार्थ दोस्त आजकल कहा मिलते है आज तो दोस्त बस अपने अपने स्वार्थ को पूरा करने तक ही रहते है अब कहा है ऐसे दोस्त की दोस्त के माथे पर आये हुए पसीने को देख कर पूरी दुनिया का खून बहाने को तैयार रहते थे और अपनी जान देकर अपनी दोस्ती की मिसाल कायम रखते थे ...अबे बता तो क्या हुआ है ...आग लगा देंगे ...बोल तो सही ...भाई अब नहीं लिखा जा रहा है सोच सोच कर किस किस ने कहा कहा क्या क्या कुर्बान किया था भाई जी बचपन की दोस्ती बहुत सच्चे दोस्त होते थे ...अपने हर सच्चे दोस्त को दिल से राम राम ...
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Saturday, February 14, 2015
Wednesday, October 15, 2014
कॉफ़ी -शॉप...दो कप कॉफ़ी
जापान के टोक्यो शहर के निकट एक कस्बा अपनी खुशहाली के लिए प्रसिद्द था एक बार एक व्यक्ति उस कसबे की खुशहाली का कारण जानने के लिए सुबह -सुबह वहाँ पहुंचा . कस्बे में घुसते ही उसे एक कॉफ़ी -शॉप दिखायी दी। उसने मन ही मन सोचा कि मैं यहाँ बैठ कर चुप -चाप लोगों को देखता हूँ , और वह धीरे -धीरे आगे बढ़ते हुए शॉप के अंदर लगी एक कुर्सी पर जा कर बैठ गया .कॉफ़ी-शॉप शहर के रेस्टोरेंटस की तरह ही थी , पर वहाँ उसे लोगों का व्यवहार कुछ अजीब लगा .एक आदमी शॉप में आया और उसने दो कॉफ़ी के पैसे देते हुए कहा , “ दो कप कॉफ़ी , एक मेरे लिए और एक उस दीवार पर। ”
व्यक्ति दीवार की तरफ देखने लगा लेकिन उसे वहाँ कोई नज़र नहीं आया , पर फिर भी उस आदमी को कॉफ़ी देने के बाद वेटर दीवार के पास गया और उस पर कागज़ का एक टुकड़ा चिपका दिया , जिसपर “एक कप कॉफ़ी ” लिखा था .व्यक्ति समझ नहीं पाया कि आखिर माजरा क्या है . उसने सोचा कि कुछ देर और बैठता हूँ , और समझने की कोशिश करता हूँ .
थोड़ी देर बाद एक गरीब मजदूर वहाँ आया , उसके कपड़े फटे -पुराने थे पर फिर भी वह पुरे आत्म -विश्वास के साथ शॉप में घुसा और आराम से एक कुर्सी पर बैठ गया .व्यक्ति सोच रहा था कि एक मजदूर के लिए कॉफ़ी पर इतने पैसे बर्वाद करना कोई समझदारी नहीं है …तभी वेटर मजदूर के पास आर्डर लेने पंहुचा .
“ सर , आपका आर्डर प्लीज !”, वेटर बोला .
“ दीवार से एक कप कॉफ़ी .” , मजदूर ने जवाब दिया .
वेटर ने मजदूर से बिना पैसे लिए एक कप कॉफ़ी दी और दीवार पर लगी ढेर सारे कागज के टुकड़ों में से “एक कप कॉफ़ी ” लिखा एक टुकड़ा निकाल कर डस्टबिन में फेंक दिया .व्यक्ति को अब सारी बात समझ आ गयी थी . कसबे के लोगों का ज़रूरतमंदों के प्रति यह रवैया देखकर वह भाव-विभोर हो गया … उसे लगा , सचमुच लोगों ने मदद का कितना अच्छा तरीका निकाला है जहां एक गरीब मजदूर भी बिना अपना आत्मसम्मान कम किये एक अच्छी सी कॉफ़ी -शॉप में खाने -पीने का आनंद ले सकता है .
जय बाबा बनारस...
व्यक्ति दीवार की तरफ देखने लगा लेकिन उसे वहाँ कोई नज़र नहीं आया , पर फिर भी उस आदमी को कॉफ़ी देने के बाद वेटर दीवार के पास गया और उस पर कागज़ का एक टुकड़ा चिपका दिया , जिसपर “एक कप कॉफ़ी ” लिखा था .व्यक्ति समझ नहीं पाया कि आखिर माजरा क्या है . उसने सोचा कि कुछ देर और बैठता हूँ , और समझने की कोशिश करता हूँ .
थोड़ी देर बाद एक गरीब मजदूर वहाँ आया , उसके कपड़े फटे -पुराने थे पर फिर भी वह पुरे आत्म -विश्वास के साथ शॉप में घुसा और आराम से एक कुर्सी पर बैठ गया .व्यक्ति सोच रहा था कि एक मजदूर के लिए कॉफ़ी पर इतने पैसे बर्वाद करना कोई समझदारी नहीं है …तभी वेटर मजदूर के पास आर्डर लेने पंहुचा .
“ सर , आपका आर्डर प्लीज !”, वेटर बोला .
“ दीवार से एक कप कॉफ़ी .” , मजदूर ने जवाब दिया .
वेटर ने मजदूर से बिना पैसे लिए एक कप कॉफ़ी दी और दीवार पर लगी ढेर सारे कागज के टुकड़ों में से “एक कप कॉफ़ी ” लिखा एक टुकड़ा निकाल कर डस्टबिन में फेंक दिया .व्यक्ति को अब सारी बात समझ आ गयी थी . कसबे के लोगों का ज़रूरतमंदों के प्रति यह रवैया देखकर वह भाव-विभोर हो गया … उसे लगा , सचमुच लोगों ने मदद का कितना अच्छा तरीका निकाला है जहां एक गरीब मजदूर भी बिना अपना आत्मसम्मान कम किये एक अच्छी सी कॉफ़ी -शॉप में खाने -पीने का आनंद ले सकता है .
जय बाबा बनारस...
Saturday, September 27, 2014
भिन्डी
एक राजा था उसके महल में एक नया खानसामा ( खाना बनाने वाला ) आया जो बहुत ही चतुर व्यक्ति था और भोजन बहुत लज़ीज़ बनाता था ! उस खानसामे को पता था की राजा की पसंदीदा सब्ज़ी भिन्डी है ! उसने इसीलिए रात के भोजन में भिन्डी बनाई ! जब राजा ने देखा की भिन्डी बनाई गयी है राजा खुश हो गया और चूँकि भिन्डी स्वादिष्ट थी तो भिन्डी खा कर तो और भी गदगद हो गया ! राजा ने खानसामे से खुश होते हुए कहा की : मज़ा आ गया आज तो भिन्डी खा कर भिन्डी क्या ज़बरदस्त सब्ज़ी होती है वाह ! इस पर खानसामा बोला अरे साहब भिन्डी का तो कोई जवाब ही नहीं मैं तो कहता हूँ की सब्ज़ियों की रानी है भिन्डी, भिन्डी जैसी कोई सब्ज़ी नहीं ! राजा और भी खुश हुआ और अपने गले से हीरे की माला निकाल कर उस खानसामे को दी और कहा ये लो तुम्हारा इनाम ! अगले दिन दोपहर का भोजन करने जैसे ही राजा बैठा उसने देखा की खानसामे ने फिर भिन्डी बना दी लेकिन अब राजा ने भिन्डी की इतनी तारीफ कर दी थी उसे मना करते नहीं बना और उसे फिर भिन्डी की तारीफ करना पड़ी और खाना पड़ी और खानसामे ने भी भिन्डी की तारीफ की और राजा ने फिर अपने गले से माला निकाल कर खानसामे को दे दी ! अब बारी थी रात के भोजन की रात के भोजन में फिरसे खानसामे ने भिन्डी बना दी राजा लगातार 2 दिनो से भिन्डी खाके उक्ता चुका था उसने लेकिन उसने जैसे तैसे मन मार के भिन्डी खा ली और चुपचाप एक माला गले से निकाल कर खानसामे को दे दी ! अब अगले दिन जब फिर भोजन करने बैठा राजा उसे फिर भिन्डी नज़र आ गयी ! राजा आग बबूला हो गया भिन्डी देख कर और बोला क्या वाहियात सब्ज़ी होती है भिन्डी क्यों बना दी किसने कहा तुम्हे भिन्डी बनाने को !! खानसामा विनम्रतापूर्वक बोला की साहब भिन्डी तो निहायती घटिया सब्ज़ी होती है मैं तो कहता हूँ की किसी बेवक़ूफ़ को ही पसंद होगी भिन्डी, पता नहीं कैसे खा लेते है लोग भिन्डी !! राजा का ये सुनते ही और भी दिमाग खराब हो गया और वो चिल्लाता हुआ बोला अरे नामाकूल कल तक जब तक मैं भिन्डी की तारीफ कर रहा था तू भी भिन्डी की तारीफ कर रहा था और अब जब मैं भिन्डी की बुराई करने लगा तो तू भी भिन्डी की बुराई करने लगा बड़ा होशियार है तू !! इस पर खानसामा मुस्कुराता हुआ बोला : साहब मैं आपका नौकर हूँ भिन्डी का नहीं !!
जय बाबा बनारस .....
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भिन्डी
एक राजा था उसके महल में एक नया खानसामा ( खाना बनाने वाला ) आया जो बहुत ही चतुर व्यक्ति था और भोजन बहुत लज़ीज़ बनाता था ! उस खानसामे को पता था की राजा की पसंदीदा सब्ज़ी भिन्डी है ! उसने इसीलिए रात के भोजन में भिन्डी बनाई ! जब राजा ने देखा की भिन्डी बनाई गयी है राजा खुश हो गया और चूँकि भिन्डी स्वादिष्ट थी तो भिन्डी खा कर तो और भी गदगद हो गया ! राजा ने खानसामे से खुश होते हुए कहा की : मज़ा आ गया आज तो भिन्डी खा कर भिन्डी क्या ज़बरदस्त सब्ज़ी होती है वाह ! इस पर खानसामा बोला अरे साहब भिन्डी का तो कोई जवाब ही नहीं मैं तो कहता हूँ की सब्ज़ियों की रानी है भिन्डी, भिन्डी जैसी कोई सब्ज़ी नहीं ! राजा और भी खुश हुआ और अपने गले से हीरे की माला निकाल कर उस खानसामे को दी और कहा ये लो तुम्हारा इनाम ! अगले दिन दोपहर का भोजन करने जैसे ही राजा बैठा उसने देखा की खानसामे ने फिर भिन्डी बना दी लेकिन अब राजा ने भिन्डी की इतनी तारीफ कर दी थी उसे मना करते नहीं बना और उसे फिर भिन्डी की तारीफ करना पड़ी और खाना पड़ी और खानसामे ने भी भिन्डी की तारीफ की और राजा ने फिर अपने गले से माला निकाल कर खानसामे को दे दी ! अब बारी थी रात के भोजन की रात के भोजन में फिरसे खानसामे ने भिन्डी बना दी राजा लगातार 2 दिनो से भिन्डी खाके उक्ता चुका था उसने लेकिन उसने जैसे तैसे मन मार के भिन्डी खा ली और चुपचाप एक माला गले से निकाल कर खानसामे को दे दी ! अब अगले दिन जब फिर भोजन करने बैठा राजा उसे फिर भिन्डी नज़र आ गयी ! राजा आग बबूला हो गया भिन्डी देख कर और बोला क्या वाहियात सब्ज़ी होती है भिन्डी क्यों बना दी किसने कहा तुम्हे भिन्डी बनाने को !! खानसामा विनम्रतापूर्वक बोला की साहब भिन्डी तो निहायती घटिया सब्ज़ी होती है मैं तो कहता हूँ की किसी बेवक़ूफ़ को ही पसंद होगी भिन्डी, पता नहीं कैसे खा लेते है लोग भिन्डी !! राजा का ये सुनते ही और भी दिमाग खराब हो गया और वो चिल्लाता हुआ बोला अरे नामाकूल कल तक जब तक मैं भिन्डी की तारीफ कर रहा था तू भी भिन्डी की तारीफ कर रहा था और अब जब मैं भिन्डी की बुराई करने लगा तो तू भी भिन्डी की बुराई करने लगा बड़ा होशियार है तू !! इस पर खानसामा मुस्कुराता हुआ बोला : साहब मैं आपका नौकर हूँ भिन्डी का नहीं !!
जय बाबा बनारस .....
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भिन्डी
एक राजा था उसके महल में एक नया खानसामा ( खाना बनाने वाला ) आया जो बहुत ही चतुर व्यक्ति था और भोजन बहुत लज़ीज़ बनाता था ! उस खानसामे को पता था की राजा की पसंदीदा सब्ज़ी भिन्डी है ! उसने इसीलिए रात के भोजन में भिन्डी बनाई ! जब राजा ने देखा की भिन्डी बनाई गयी है राजा खुश हो गया और चूँकि भिन्डी स्वादिष्ट थी तो भिन्डी खा कर तो और भी गदगद हो गया ! राजा ने खानसामे से खुश होते हुए कहा की : मज़ा आ गया आज तो भिन्डी खा कर भिन्डी क्या ज़बरदस्त सब्ज़ी होती है वाह ! इस पर खानसामा बोला अरे साहब भिन्डी का तो कोई जवाब ही नहीं मैं तो कहता हूँ की सब्ज़ियों की रानी है भिन्डी, भिन्डी जैसी कोई सब्ज़ी नहीं ! राजा और भी खुश हुआ और अपने गले से हीरे की माला निकाल कर उस खानसामे को दी और कहा ये लो तुम्हारा इनाम ! अगले दिन दोपहर का भोजन करने जैसे ही राजा बैठा उसने देखा की खानसामे ने फिर भिन्डी बना दी लेकिन अब राजा ने भिन्डी की इतनी तारीफ कर दी थी उसे मना करते नहीं बना और उसे फिर भिन्डी की तारीफ करना पड़ी और खाना पड़ी और खानसामे ने भी भिन्डी की तारीफ की और राजा ने फिर अपने गले से माला निकाल कर खानसामे को दे दी ! अब बारी थी रात के भोजन की रात के भोजन में फिरसे खानसामे ने भिन्डी बना दी राजा लगातार 2 दिनो से भिन्डी खाके उक्ता चुका था उसने लेकिन उसने जैसे तैसे मन मार के भिन्डी खा ली और चुपचाप एक माला गले से निकाल कर खानसामे को दे दी ! अब अगले दिन जब फिर भोजन करने बैठा राजा उसे फिर भिन्डी नज़र आ गयी ! राजा आग बबूला हो गया भिन्डी देख कर और बोला क्या वाहियात सब्ज़ी होती है भिन्डी क्यों बना दी किसने कहा तुम्हे भिन्डी बनाने को !! खानसामा विनम्रतापूर्वक बोला की साहब भिन्डी तो निहायती घटिया सब्ज़ी होती है मैं तो कहता हूँ की किसी बेवक़ूफ़ को ही पसंद होगी भिन्डी, पता नहीं कैसे खा लेते है लोग भिन्डी !! राजा का ये सुनते ही और भी दिमाग खराब हो गया और वो चिल्लाता हुआ बोला अरे नामाकूल कल तक जब तक मैं भिन्डी की तारीफ कर रहा था तू भी भिन्डी की तारीफ कर रहा था और अब जब मैं भिन्डी की बुराई करने लगा तो तू भी भिन्डी की बुराई करने लगा बड़ा होशियार है तू !! इस पर खानसामा मुस्कुराता हुआ बोला : साहब मैं आपका नौकर हूँ भिन्डी का नहीं !!
जय बाबा बनारस .....
जय बाबा बनारस .....
भिन्डी
एक राजा था उसके महल में एक नया खानसामा ( खाना बनाने वाला ) आया जो बहुत ही चतुर व्यक्ति था और भोजन बहुत लज़ीज़ बनाता था ! उस खानसामे को पता था की राजा की पसंदीदा सब्ज़ी भिन्डी है ! उसने इसीलिए रात के भोजन में भिन्डी बनाई ! जब राजा ने देखा की भिन्डी बनाई गयी है राजा खुश हो गया और चूँकि भिन्डी स्वादिष्ट थी तो भिन्डी खा कर तो और भी गदगद हो गया ! राजा ने खानसामे से खुश होते हुए कहा की : मज़ा आ गया आज तो भिन्डी खा कर भिन्डी क्या ज़बरदस्त सब्ज़ी होती है वाह ! इस पर खानसामा बोला अरे साहब भिन्डी का तो कोई जवाब ही नहीं मैं तो कहता हूँ की सब्ज़ियों की रानी है भिन्डी, भिन्डी जैसी कोई सब्ज़ी नहीं ! राजा और भी खुश हुआ और अपने गले से हीरे की माला निकाल कर उस खानसामे को दी और कहा ये लो तुम्हारा इनाम ! अगले दिन दोपहर का भोजन करने जैसे ही राजा बैठा उसने देखा की खानसामे ने फिर भिन्डी बना दी लेकिन अब राजा ने भिन्डी की इतनी तारीफ कर दी थी उसे मना करते नहीं बना और उसे फिर भिन्डी की तारीफ करना पड़ी और खाना पड़ी और खानसामे ने भी भिन्डी की तारीफ की और राजा ने फिर अपने गले से माला निकाल कर खानसामे को दे दी ! अब बारी थी रात के भोजन की रात के भोजन में फिरसे खानसामे ने भिन्डी बना दी राजा लगातार 2 दिनो से भिन्डी खाके उक्ता चुका था उसने लेकिन उसने जैसे तैसे मन मार के भिन्डी खा ली और चुपचाप एक माला गले से निकाल कर खानसामे को दे दी ! अब अगले दिन जब फिर भोजन करने बैठा राजा उसे फिर भिन्डी नज़र आ गयी ! राजा आग बबूला हो गया भिन्डी देख कर और बोला क्या वाहियात सब्ज़ी होती है भिन्डी क्यों बना दी किसने कहा तुम्हे भिन्डी बनाने को !! खानसामा विनम्रतापूर्वक बोला की साहब भिन्डी तो निहायती घटिया सब्ज़ी होती है मैं तो कहता हूँ की किसी बेवक़ूफ़ को ही पसंद होगी भिन्डी, पता नहीं कैसे खा लेते है लोग भिन्डी !! राजा का ये सुनते ही और भी दिमाग खराब हो गया और वो चिल्लाता हुआ बोला अरे नामाकूल कल तक जब तक मैं भिन्डी की तारीफ कर रहा था तू भी भिन्डी की तारीफ कर रहा था और अब जब मैं भिन्डी की बुराई करने लगा तो तू भी भिन्डी की बुराई करने लगा बड़ा होशियार है तू !! इस पर खानसामा मुस्कुराता हुआ बोला : साहब मैं आपका नौकर हूँ भिन्डी का नहीं !!
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भिन्डी
एक राजा था उसके महल में एक नया खानसामा ( खाना बनाने वाला ) आया जो बहुत ही चतुर व्यक्ति था और भोजन बहुत लज़ीज़ बनाता था ! उस खानसामे को पता था की राजा की पसंदीदा सब्ज़ी भिन्डी है ! उसने इसीलिए रात के भोजन में भिन्डी बनाई ! जब राजा ने देखा की भिन्डी बनाई गयी है राजा खुश हो गया और चूँकि भिन्डी स्वादिष्ट थी तो भिन्डी खा कर तो और भी गदगद हो गया ! राजा ने खानसामे से खुश होते हुए कहा की : मज़ा आ गया आज तो भिन्डी खा कर भिन्डी क्या ज़बरदस्त सब्ज़ी होती है वाह ! इस पर खानसामा बोला अरे साहब भिन्डी का तो कोई जवाब ही नहीं मैं तो कहता हूँ की सब्ज़ियों की रानी है भिन्डी, भिन्डी जैसी कोई सब्ज़ी नहीं ! राजा और भी खुश हुआ और अपने गले से हीरे की माला निकाल कर उस खानसामे को दी और कहा ये लो तुम्हारा इनाम ! अगले दिन दोपहर का भोजन करने जैसे ही राजा बैठा उसने देखा की खानसामे ने फिर भिन्डी बना दी लेकिन अब राजा ने भिन्डी की इतनी तारीफ कर दी थी उसे मना करते नहीं बना और उसे फिर भिन्डी की तारीफ करना पड़ी और खाना पड़ी और खानसामे ने भी भिन्डी की तारीफ की और राजा ने फिर अपने गले से माला निकाल कर खानसामे को दे दी ! अब बारी थी रात के भोजन की रात के भोजन में फिरसे खानसामे ने भिन्डी बना दी राजा लगातार 2 दिनो से भिन्डी खाके उक्ता चुका था उसने लेकिन उसने जैसे तैसे मन मार के भिन्डी खा ली और चुपचाप एक माला गले से निकाल कर खानसामे को दे दी ! अब अगले दिन जब फिर भोजन करने बैठा राजा उसे फिर भिन्डी नज़र आ गयी ! राजा आग बबूला हो गया भिन्डी देख कर और बोला क्या वाहियात सब्ज़ी होती है भिन्डी क्यों बना दी किसने कहा तुम्हे भिन्डी बनाने को !! खानसामा विनम्रतापूर्वक बोला की साहब भिन्डी तो निहायती घटिया सब्ज़ी होती है मैं तो कहता हूँ की किसी बेवक़ूफ़ को ही पसंद होगी भिन्डी, पता नहीं कैसे खा लेते है लोग भिन्डी !! राजा का ये सुनते ही और भी दिमाग खराब हो गया और वो चिल्लाता हुआ बोला अरे नामाकूल कल तक जब तक मैं भिन्डी की तारीफ कर रहा था तू भी भिन्डी की तारीफ कर रहा था और अब जब मैं भिन्डी की बुराई करने लगा तो तू भी भिन्डी की बुराई करने लगा बड़ा होशियार है तू !! इस पर खानसामा मुस्कुराता हुआ बोला : साहब मैं आपका नौकर हूँ भिन्डी का नहीं !!
जय बाबा बनारस .....
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Thursday, February 13, 2014
नाशपाती का पेड़ एक कहानी ...
बहुत समय पहले की बात है , सुदूर दक्षिण में किसी प्रतापी राजा का राज्य था . राजा के तीन पुत्र थे, एक दिन राजा के मन में आया कि पुत्रों को को कुछ ऐसी शिक्षा दी जाये कि समय आने पर वो राज-काज सम्भाल सकें.
इसी विचार के साथ राजा ने सभी पुत्रों को दरबार में बुलाया और बोला , “ पुत्रों , हमारे राज्य में नाशपाती का कोई वृक्ष नहीं है , मैं चाहता हूँ तुम सब चार-चार महीने के अंतराल पर इस वृक्ष की तलाश में जाओ और पता लगाओ कि वो कैसा होता है ?” राजा की आज्ञा पा कर तीनो पुत्र बारी-बारी से गए और वापस लौट आये .
सभी पुत्रों के लौट आने पर राजा ने पुनः सभी को दरबार में बुलाया और उस पेड़ के बारे में बताने को कहा।
पहला पुत्र बोला , “ पिताजी वह पेड़ तो बिलकुल टेढ़ा – मेढ़ा , और सूखा हुआ था .”
“ नहीं -नहीं वो तो बिलकुल हरा –भरा था , लेकिन शायद उसमे कुछ कमी थी क्योंकि उसपर एक भी फल नहीं लगा था .”, दुसरे पुत्र ने पहले को बीच में ही रोकते हुए कहा .
फिर तीसरा पुत्र बोला , “ भैया , लगता है आप भी कोई गलत पेड़ देख आये क्योंकि मैंने सचमुच नाशपाती का पेड़ देखा , वो बहुत ही शानदार था और फलों से लदा पड़ा था .”
और तीनो पुत्र अपनी -अपनी बात को लेकर आपस में विवाद करने लगे कि तभी राजा अपने सिंघासन से उठे और बोले , “ पुत्रों , तुम्हे आपस में बहस करने की कोई आवश्यकता नहीं है , दरअसल तुम तीनो ही वृक्ष का सही वर्णन कर रहे हो . मैंने जानबूझ कर तुम्हे अलग- अलग मौसम में वृक्ष खोजने भेजा था और तुमने जो देखा वो उस मौसम के अनुसार था.
मैं चाहता हूँ कि इस अनुभव के आधार पर तुम तीन बातों को गाँठ बाँध लो :
पहली, किसी चीज के बारे में सही और पूर्ण जानकारी चाहिए तो तुम्हे उसे लम्बे समय तक देखना-परखना चाहिए . फिर चाहे वो कोई विषय हो ,वस्तु हो या फिर कोई व्यक्ति ही क्यों न हो ।
दूसरी, हर मौसम एक सा नहीं होता , जिस प्रकार वृक्ष मौसम के अनुसार सूखता, हरा-भरा या फलों से लदा रहता है उसी प्रकार मनुषय के जीवन में भी उतार चढाव आते रहते हैं , अतः अगर तुम कभी भी बुरे दौर से गुजर रहे हो तो अपनी हिम्मत और धैर्य बनाये रखो , समय अवश्य बदलता है।
औरतीसरीबात , अपनी बात को ही सही मान कर उस पर अड़े मत रहो, अपना दिमाग खोलो , और दूसरों के विचारों को भी जानो। यह संसार ज्ञान से भरा पड़ा है , चाह कर भी तुम अकेले सारा ज्ञान अर्जित नहीं कर सकते , इसलिए भ्रम की स्थिति में किसी ज्ञानी व्यक्ति से सलाह लेने में संकोच मत करो।
जय बाबा बनांरस....
इसी विचार के साथ राजा ने सभी पुत्रों को दरबार में बुलाया और बोला , “ पुत्रों , हमारे राज्य में नाशपाती का कोई वृक्ष नहीं है , मैं चाहता हूँ तुम सब चार-चार महीने के अंतराल पर इस वृक्ष की तलाश में जाओ और पता लगाओ कि वो कैसा होता है ?” राजा की आज्ञा पा कर तीनो पुत्र बारी-बारी से गए और वापस लौट आये .
सभी पुत्रों के लौट आने पर राजा ने पुनः सभी को दरबार में बुलाया और उस पेड़ के बारे में बताने को कहा।
पहला पुत्र बोला , “ पिताजी वह पेड़ तो बिलकुल टेढ़ा – मेढ़ा , और सूखा हुआ था .”
“ नहीं -नहीं वो तो बिलकुल हरा –भरा था , लेकिन शायद उसमे कुछ कमी थी क्योंकि उसपर एक भी फल नहीं लगा था .”, दुसरे पुत्र ने पहले को बीच में ही रोकते हुए कहा .
फिर तीसरा पुत्र बोला , “ भैया , लगता है आप भी कोई गलत पेड़ देख आये क्योंकि मैंने सचमुच नाशपाती का पेड़ देखा , वो बहुत ही शानदार था और फलों से लदा पड़ा था .”
और तीनो पुत्र अपनी -अपनी बात को लेकर आपस में विवाद करने लगे कि तभी राजा अपने सिंघासन से उठे और बोले , “ पुत्रों , तुम्हे आपस में बहस करने की कोई आवश्यकता नहीं है , दरअसल तुम तीनो ही वृक्ष का सही वर्णन कर रहे हो . मैंने जानबूझ कर तुम्हे अलग- अलग मौसम में वृक्ष खोजने भेजा था और तुमने जो देखा वो उस मौसम के अनुसार था.
मैं चाहता हूँ कि इस अनुभव के आधार पर तुम तीन बातों को गाँठ बाँध लो :
पहली, किसी चीज के बारे में सही और पूर्ण जानकारी चाहिए तो तुम्हे उसे लम्बे समय तक देखना-परखना चाहिए . फिर चाहे वो कोई विषय हो ,वस्तु हो या फिर कोई व्यक्ति ही क्यों न हो ।
दूसरी, हर मौसम एक सा नहीं होता , जिस प्रकार वृक्ष मौसम के अनुसार सूखता, हरा-भरा या फलों से लदा रहता है उसी प्रकार मनुषय के जीवन में भी उतार चढाव आते रहते हैं , अतः अगर तुम कभी भी बुरे दौर से गुजर रहे हो तो अपनी हिम्मत और धैर्य बनाये रखो , समय अवश्य बदलता है।
औरतीसरीबात , अपनी बात को ही सही मान कर उस पर अड़े मत रहो, अपना दिमाग खोलो , और दूसरों के विचारों को भी जानो। यह संसार ज्ञान से भरा पड़ा है , चाह कर भी तुम अकेले सारा ज्ञान अर्जित नहीं कर सकते , इसलिए भ्रम की स्थिति में किसी ज्ञानी व्यक्ति से सलाह लेने में संकोच मत करो।
जय बाबा बनांरस....
Thursday, January 2, 2014
जंगल के कुत्ते और उनका आपसी प्रेम ...
एक दिन की घटना : जंगल में दो कुत्ते एक जंगल में आपस में लड़ रहे थे।।
उसने एक कुत्ता ऐसा था जो अपने को दुसरे कुत्ते से ज्यादा इमानदार बताता था।। दोनों कुत्ते जोर जोर से एक दुसरे पर खूब भोंक रहे थे तभी एक बिजनेसमैन बाज जो की इटली की एक कुतिया के इशारे पर जंगल में आया उसने दोनों कुत्तों की एक फाइव स्टार गुफा में मीटिंग करायी और कहा की यदि तुम लोग ऐसे ही लड़ते रहे तो शिकार नहीं कर पाओगे और जंगल में सज्जनो और शाकाहारियों की सत्ता हो जाएगी एवं जंगल स्वर्ग बन जायेगा ।।
एक काम करो तुम दोनों एक दुसरे पर थोडा थोडा भोंको मगर एक दुसरे को कभी काटना मत और शिकार करते रहो मिल बाट कर खाओ इस प्रकार इटली की कुतिया भी खुश रहेगी जिसने मुझे यहाँ भेजा है और इस जंगल में शेर नहीं आएगा।। इस प्रकार दोनों कुत्तों में समझौता और गठबंधन हो गया।।
थोड़े दिन बाद : दो कुत्ते एक दुसरे के ऊपर भोक भोंक कर मिल बाट कर शिकार खा रहे थे।।
जय बाबा बनारस .....
उसने एक कुत्ता ऐसा था जो अपने को दुसरे कुत्ते से ज्यादा इमानदार बताता था।। दोनों कुत्ते जोर जोर से एक दुसरे पर खूब भोंक रहे थे तभी एक बिजनेसमैन बाज जो की इटली की एक कुतिया के इशारे पर जंगल में आया उसने दोनों कुत्तों की एक फाइव स्टार गुफा में मीटिंग करायी और कहा की यदि तुम लोग ऐसे ही लड़ते रहे तो शिकार नहीं कर पाओगे और जंगल में सज्जनो और शाकाहारियों की सत्ता हो जाएगी एवं जंगल स्वर्ग बन जायेगा ।।
एक काम करो तुम दोनों एक दुसरे पर थोडा थोडा भोंको मगर एक दुसरे को कभी काटना मत और शिकार करते रहो मिल बाट कर खाओ इस प्रकार इटली की कुतिया भी खुश रहेगी जिसने मुझे यहाँ भेजा है और इस जंगल में शेर नहीं आएगा।। इस प्रकार दोनों कुत्तों में समझौता और गठबंधन हो गया।।
थोड़े दिन बाद : दो कुत्ते एक दुसरे के ऊपर भोक भोंक कर मिल बाट कर शिकार खा रहे थे।।
जय बाबा बनारस .....
Tuesday, December 31, 2013
जिस तरह से एक मच्छर साला आदमी को हिजड़ा बना सकता है ठीक उसी तरह से एक गद्दार देश को गुलाम बना सकता है ....
राजीव dixit की स्पीच ....का एक पार्ट मीर जाफर एक देश का गद्दार ...
मेरे एक परिचित है प्रोफेसर धरमपाल, वो ४० वर्ष तक यूरोप में रहे है, मैंने एक बार उनको एक चिट्ठी लिखी, मैंने कहा सर, मै ये जानना चाहता हु बेसिक क्वेश्चन कि पलासी के युद्ध में अंग्रेजो के पास कितने सिपाही थे. तो उन्होंने कहा देखो राजीव, अगर तुमको ये जानना है तो बहुत कुछ जानना पड़ेगा, और तुम तैयार हो जानने के लिए, तो मैंने कहा मै सब जानना चाहता हु. मै इतिहास का विद्यार्थी नहीं लगा लेकिन इतिहास को समझना चाहता हु कि ऐसी कौन सी ख़ास बात थी जो हम अंग्रेजो के गुलाम हो गए, ये समझ में तो आना चाहिए अपने को, कि कैसे हम अंग्रेजो के गुलाम हो गए. ये इतना बड़ा देश, ३४ करोड़ की आबादी वाला देश ५० हजार अंग्रेजो का गुलाम कैसे हो गया ये समझना चाहिए. तो वो पलासी के युद्ध पर से वो समझ में आया. उन्होंने कुछ दस्तावेज़ मुझे भेजें, फोटोकॉपी करा के और मेरे पास अभी भी है. उन दस्तावेजो को जब मै पढता था तो मुझे पता चला कि पलासी के युद्ध में अंग्रेजो के पास मात्र ३०० सिपाही थे, ३ हंड्रेड. और सिराजुद्दोला के पास १८,००० सिपाही थे. अब किसी भी सामने के विद्यार्थी से, बच्चे से, या सामान्य बुद्धि के आदमी से आप ये पूछो के एक बाजु में ३०० सिपाही, और दुसरे बाजु में १८,००० सिपाही, कौन जीतेगा? १८,००० सिपाही जिनके पास है वो जीतेगा. लेकिन जीता कौन ? जिनके पास मात्र ३०० सिपाही थे वो जीत गए, और जिनके पास १८,००० सिपाही थे वो हार गए. और हिंदुस्तान के, भारतवर्ष के एक एक सिपाही के बारे में अंग्रेजो के पार्लियामेंट में ये कहा जाता था कि भारतवर्ष का १ सिपाही अंग्रेजो के ५ सिपाही को मारने के लिए काफी है, इतना ताकतवर, तो इतने ताकतवर १८,००० सिपाही अंग्रेजो के कमजोर ३०० सिपाहियो से कैसे हारे ये बिलकुल गम्भीरता से समझने की जरुरत है. और उन दस्तावेजो को देखने के बाद मुझे पता चला कि हम कैसे हारे. अंग्रेजो की तरफ से जो लड़ने आया था उसका नाम था रोबर्ट क्लाइव, वो अंग्रेजी सेना का सेनापति था. और भारतवर्ष की तरफ से जो लड़ रहा था सिराजुद्दोला, उसका भी एक सेनापति था, उसका नाम था मीर जाफ़र. तो हुआ क्या था रोबर्ट क्लाइव ये जनता था कि अगर भारतीय सिपाहियो से सामने से हम लड़ेंगे तो हम ३०० लोग है मारे जाएँगे, १ घंटे भी युद्ध नहीं चलेगा. और क्लाइव ने इस बात को कई बार ब्रिटिस पार्लियामेंट को चिट्ठी लिख के कहा था. क्लाइव की २ चिट्ठियाँ है उन दस्तावेजो में, एक चिट्ठी में क्लाइव ने लिखा कि हम सिर्फ ३०० सिपाही है, और सिराजुद्दोला के पास १८००० सिपाही है. हम युद्ध जीत नहीं सकते है, अगर ब्रिटिश पार्लियामेंट अंग्रेजी पार्लियामेंट ये चाहती है कि हम पलासी का युद्ध जीते, तो जरुरी है कि हमारे पास और सिपाही भेजे जाए. उस चिट्ठी के जवाब में क्लाइव को ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक चिट्ठी मिली थी और वो बहुत मजेदार है उसको समझना चाहिए. उस चिट्ठी में ब्रिटिश पार्लियामेंट के लोगों ने ये लिखा कि हमारे पास इससे ज्यादा सिपाही है नहीं. क्यों नहीं है ? क्योकि १७५७ में जब पलासी का युद्ध शुरु होने वाला था उसी समय अंग्रेजी सिपाही फ़्रांस में नेपोलियन बोनापार्ट के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे. और नेपोलियन बोनापार्ट क्या था अंग्रेजो को मार मार के फ़्रांस से भगा रहा था. तो पूरी की पूरी अंग्रेजी ताकत और सेना नेपोलियन बोनापार्ट के खिलाफ फ़्रांस में लडती थी इसी लिए वो ज्यादा सिपाही दे नहीं सकते थे, तो उन्होंने कहा अपने पार्लियामेंट में कि हम इससे ज्यादा सिपाही आपको दे नहीं सकते है. जो ३०० सिपाही है उन्ही से आपको पलासी का युद्ध जीतना होगा. तो रोबर्ट क्लाइव ने apaaaaaaaaaअपने दो जासूस लगाए, उसने कहा देखो युद्ध लड़ेंगे तो मारे जाएँगे, अब आप एक काम करो, उसने दो अपने साथिओं को कहा कि आप जाओ और सिराजुद्दोला की आर्मी में पता लगाओ कि कोई ऐसा आदमी है क्या जिसको रिश्वत दे दें. जिसको लालच दे दें. और रिश्वत के लालच में जो अपने देश से गद्दारी करने को तैयार हो जाए, ऐसा आदमी तलाश करो. उसके दो जासूसों ने बराबर सिराजुद्दोला की आर्मी में पता लगाया कि हां एक आदमी है, उसका नाम है मीर जाफर, अगर आप उसको रिश्वत दे दो, तो वो हिंदुस्तान को बेंच डालेगा. इतना लालची आदमी है. और अगर आप उसको कुर्सी का लालच दे दो, तब तो वो हिंदुस्तान की ७ पुश्तो को बेंच देगा. और मीर जाफर क्या था, मीर जाफर ऐसा आदमी था जो रात दिन एक ही सपना देखता था कि एक न एक दिन मुझे बंगाल का नवाब बनना है. और उस ज़माने में बंगाल का नवाब बनना ऐसा ही होता था जैसे आज के ज़माने में बहुत नेता ये सपना देखते है कि मुझे हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री बनना है, चाहे देश बेंचना पड़े. तो मीर जाफर के मन का ये जो लालच था कि मुझे बंगाल का नवाब बनना है. माने कुर्सी चाहिए, और मुझे पूंजी चाहिए, पैसा चाहिए, सत्ता चाहिए और पैसा चाहिए. ये दोनो लालच उस समय मीर जाफर के मन में सबसे ज्यादा प्रबल थे, तो उस लालच को रोबर्ट क्लाइव ने बराबर भांप लिया. तो रोबर्ट क्लाइव ने मीर जाफर को चिट्ठी लिखी है. वो चिट्ठी दस्तावेजो में मौजूद है और उसकी फोटोकोपी मेरे पास है. उसने चिट्ठी में दो ही बातें लिखी है, देखो मीर जाफर अगर तुम अंग्रेजो के साथ दोस्ती करोगे, और ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ समझौता करोगे, तो हम तुमको युद्ध जीतने के बाद बंगाल का नवाब बनाएँगे. और दूसरी बात कि जब आप बंगाल के नवाब हो जाओगे तो सारी की सारी सम्पत्ति आपकी हो जाएगी. इस सम्पत्ति में से ५ टका हमको दे देना, बाकि तुम जितना लूटना चाहो लुट लो. मीर जाफर चूँकि रात दिन ये ही सपना देखता था कि किसी तरह कुर्सी मिल जाए, और किसी तरह पैसा मिल जाए, तुरंत उसने वापस रोबर्ट क्लाइव को चिट्ठी लिखी और उसने कहा कि मुझे आपकी दोनों बातें मंजूर है. बताईए करना क्या है ? तो आखरी चिट्ठी लिखी है रोबर्ट क्लाइव ने मीर जाफर को कि आपको सिर्फ इतना करना है कि युद्ध जिस दिन शुरु होगा, उस दिन आप अपने १८,००० सिपाहियो को कहिए की वो मेरे सामने सरेंडर कर दें बिना लड़े. मीर जाफर ने कहा कि आप अपनी बात पे कायम रहोगे ? मुझे नवाब बनाना है आपको. तो रोबर्ट ने कहा कि बराबर हम अपनी बात पे कायम है, आपको हम बंगाल का नवाब बना देंगे. बस आप एक ही काम करो कि अपनी आर्मी से कहो, क्योकि वो सेनापति था आर्मी का, तो आप अपनी आर्मी को आदेश दो कि युद्ध के मैदान में वो मेरे सामने हथियार डाल दे, बिना लड़े, मीर जाफर ने कहा कि ऐसा ही होगा. और युद्ध शुरु हुआ २३ जून १७५७ को. इतिहास की जानकारी के अनुसार २३ जून १७५७ को युद्ध शुरु होने के ४० मिनट के अंदर भारतवर्ष के १८,००० सिपाहियो ने मीर जाफर के कहने पर अंग्रेजो के ३०० सिपाहियो के सामने सरेंडर कर दिया.
रोबर्ट क्लाइव ने क्या किया कि अपने ३०० सिपाहियो की मदद से हिंदुस्तान के १८,००० सिपाहियो को बंदी बनाया, और कलकत्ता में एक जगह है उसका नाम है फोर्ट विलियम, आज भी है, कभी आप जाइए, उसको देखीए. उस फोर्ट विलियम में १८,००० सिपाहियो को बंदी बना कर ले गया. १० दिन तक उसने भारतीय सिपाहियो को भूखा रखा और उसके बाद ग्यारहवे दिन सबकी हत्या कराई. और उस हत्या कराने में मीर जाफ़र रोबर्ट क्लाइव के साथ शामिल था, उसके बाद रोबर्ट क्लाइव ने क्या किया, उसने बंगाल के नवाब सिराजुद्दोला की हत्या कराई मुर्शिदाबाद में, क्योकि उस जमाने में बंगाल की राजधानी मुर्शिदाबाद होती थी, कलकत्ता नही. सिराजुद्दोला की हत्या कराने में रोबर्ट क्लाइव और मीर जाफ़र दोनों शामिल थे. और नतीजा क्या हुआ ? बंगाल का नवाब सिराजुद्दोला मारा गया, ईस्ट इंडिया कंपनी को भागने का सपना देखता था इस देश में वो मारा गया, और जो ईस्ट इंडिया कंपनी से दोस्ती करने की बात करता था वो बंगाल का नवाब हो गया, मीर जाफ़र. इस पुरे इतिहास की दुर्घटना को मै एक विशेष नजर से देखता हु. मै कई बार ऐसा सोंचता हु कि क्या मीर जाफ़र को मालूम नहीं था कि ईस्ट इंडिया कंपनी से दोस्ती करेंगे तो इस देश की गुलामी आएगी ? मिर जाफ़र जानता था इस बात को. मीर जाफ़र बराबर जानता था कि मै मेरे कुर्सी के लालच में जो खेल खेल रहा हु उस खेल में इस देश को सैंकड़ो वर्षो की गुलामी आ सकती है. ये वो जनता था. और ये भी जानता था कि अपने स्वार्थ में, अपने लालच में मै जो गद्दारी करने जा रहा हु इस देश के साथ उसके क्या दुष्परिणाम होंगे, वो भी उसको मालूम थे.
मै ऐसा सोंचता हु कि हम गुलामी से आजाद हो जाते, क्योकि १८,००० सिपाही हमारे पास थे और ३०० अंग्रेज सिपाहियो को मारना बिलकुल आसन काम था हमारे लिए. हम १७५७ में ही अंग्रेजो की गुलामी से आजाद हो जाते एक बात और दूसरी बात ये जो २०० वर्षो की गुलामी हमको झेलनी पड़ी १७५७ से १९४७ तक, और उस २०० वर्ष की गुलामी को भागने के लिए ६ लाख लोगों की जो क़ुरबानीयां हमको देनी पड़ी, वो बच गया होता. भगत सिंह, चंद्रशेखर, उधम सिंह, तांत्या टोपे, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, सुभाष चन्द्र बोस, ऐसे ऐसे नौजवानों की कुर्बानिया दी है ये कोई छोटे मोटे लोग नहीं थे. सुभाष चन्द्र बोस तो आईपीएस टोपर थे, उधम सिंह चाहता तो ऐयासी कर सकता था, बड़े बाप का बेटा था. भगत सिंह और चंद्रशेखर की भी यही हैसियत थी. चाहते तो जिन्दगी की, जवानी की रंगरलियां मानते और अपनी नौजवानी को ऐसे फंदे में नहीं फ़साते. ये सारे वो नौजवान थें जिनका खून इस देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण था. ६ लाख ऐसे नौजवानों की कुर्बानियां जो हमने दी, वो नहीं देनी पड़ती. और अंग्रेजो की जो यातनाए सही, जो अपमान हमने बर्दास्त किया, वो नहीं करना पड़ता अगर एक आदमी नहीं होता, मीर जाफ़र. लेकिन चूँकि मीर जाफ़र था, मीर जाफ़र का लालच था, कुर्सी का और पैसे का, उस लालच ने इस देश को २०० वर्ष के लिए गुलाम बना दिया.
आज तो देश मैं बहुत से मीर जाफर है ....
जय बाबा बनारस....
राजीव dixit की स्पीच ....का एक पार्ट मीर जाफर एक देश का गद्दार ...
मेरे एक परिचित है प्रोफेसर धरमपाल, वो ४० वर्ष तक यूरोप में रहे है, मैंने एक बार उनको एक चिट्ठी लिखी, मैंने कहा सर, मै ये जानना चाहता हु बेसिक क्वेश्चन कि पलासी के युद्ध में अंग्रेजो के पास कितने सिपाही थे. तो उन्होंने कहा देखो राजीव, अगर तुमको ये जानना है तो बहुत कुछ जानना पड़ेगा, और तुम तैयार हो जानने के लिए, तो मैंने कहा मै सब जानना चाहता हु. मै इतिहास का विद्यार्थी नहीं लगा लेकिन इतिहास को समझना चाहता हु कि ऐसी कौन सी ख़ास बात थी जो हम अंग्रेजो के गुलाम हो गए, ये समझ में तो आना चाहिए अपने को, कि कैसे हम अंग्रेजो के गुलाम हो गए. ये इतना बड़ा देश, ३४ करोड़ की आबादी वाला देश ५० हजार अंग्रेजो का गुलाम कैसे हो गया ये समझना चाहिए. तो वो पलासी के युद्ध पर से वो समझ में आया. उन्होंने कुछ दस्तावेज़ मुझे भेजें, फोटोकॉपी करा के और मेरे पास अभी भी है. उन दस्तावेजो को जब मै पढता था तो मुझे पता चला कि पलासी के युद्ध में अंग्रेजो के पास मात्र ३०० सिपाही थे, ३ हंड्रेड. और सिराजुद्दोला के पास १८,००० सिपाही थे. अब किसी भी सामने के विद्यार्थी से, बच्चे से, या सामान्य बुद्धि के आदमी से आप ये पूछो के एक बाजु में ३०० सिपाही, और दुसरे बाजु में १८,००० सिपाही, कौन जीतेगा? १८,००० सिपाही जिनके पास है वो जीतेगा. लेकिन जीता कौन ? जिनके पास मात्र ३०० सिपाही थे वो जीत गए, और जिनके पास १८,००० सिपाही थे वो हार गए. और हिंदुस्तान के, भारतवर्ष के एक एक सिपाही के बारे में अंग्रेजो के पार्लियामेंट में ये कहा जाता था कि भारतवर्ष का १ सिपाही अंग्रेजो के ५ सिपाही को मारने के लिए काफी है, इतना ताकतवर, तो इतने ताकतवर १८,००० सिपाही अंग्रेजो के कमजोर ३०० सिपाहियो से कैसे हारे ये बिलकुल गम्भीरता से समझने की जरुरत है. और उन दस्तावेजो को देखने के बाद मुझे पता चला कि हम कैसे हारे. अंग्रेजो की तरफ से जो लड़ने आया था उसका नाम था रोबर्ट क्लाइव, वो अंग्रेजी सेना का सेनापति था. और भारतवर्ष की तरफ से जो लड़ रहा था सिराजुद्दोला, उसका भी एक सेनापति था, उसका नाम था मीर जाफ़र. तो हुआ क्या था रोबर्ट क्लाइव ये जनता था कि अगर भारतीय सिपाहियो से सामने से हम लड़ेंगे तो हम ३०० लोग है मारे जाएँगे, १ घंटे भी युद्ध नहीं चलेगा. और क्लाइव ने इस बात को कई बार ब्रिटिस पार्लियामेंट को चिट्ठी लिख के कहा था. क्लाइव की २ चिट्ठियाँ है उन दस्तावेजो में, एक चिट्ठी में क्लाइव ने लिखा कि हम सिर्फ ३०० सिपाही है, और सिराजुद्दोला के पास १८००० सिपाही है. हम युद्ध जीत नहीं सकते है, अगर ब्रिटिश पार्लियामेंट अंग्रेजी पार्लियामेंट ये चाहती है कि हम पलासी का युद्ध जीते, तो जरुरी है कि हमारे पास और सिपाही भेजे जाए. उस चिट्ठी के जवाब में क्लाइव को ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक चिट्ठी मिली थी और वो बहुत मजेदार है उसको समझना चाहिए. उस चिट्ठी में ब्रिटिश पार्लियामेंट के लोगों ने ये लिखा कि हमारे पास इससे ज्यादा सिपाही है नहीं. क्यों नहीं है ? क्योकि १७५७ में जब पलासी का युद्ध शुरु होने वाला था उसी समय अंग्रेजी सिपाही फ़्रांस में नेपोलियन बोनापार्ट के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे. और नेपोलियन बोनापार्ट क्या था अंग्रेजो को मार मार के फ़्रांस से भगा रहा था. तो पूरी की पूरी अंग्रेजी ताकत और सेना नेपोलियन बोनापार्ट के खिलाफ फ़्रांस में लडती थी इसी लिए वो ज्यादा सिपाही दे नहीं सकते थे, तो उन्होंने कहा अपने पार्लियामेंट में कि हम इससे ज्यादा सिपाही आपको दे नहीं सकते है. जो ३०० सिपाही है उन्ही से आपको पलासी का युद्ध जीतना होगा. तो रोबर्ट क्लाइव ने apaaaaaaaaaअपने दो जासूस लगाए, उसने कहा देखो युद्ध लड़ेंगे तो मारे जाएँगे, अब आप एक काम करो, उसने दो अपने साथिओं को कहा कि आप जाओ और सिराजुद्दोला की आर्मी में पता लगाओ कि कोई ऐसा आदमी है क्या जिसको रिश्वत दे दें. जिसको लालच दे दें. और रिश्वत के लालच में जो अपने देश से गद्दारी करने को तैयार हो जाए, ऐसा आदमी तलाश करो. उसके दो जासूसों ने बराबर सिराजुद्दोला की आर्मी में पता लगाया कि हां एक आदमी है, उसका नाम है मीर जाफर, अगर आप उसको रिश्वत दे दो, तो वो हिंदुस्तान को बेंच डालेगा. इतना लालची आदमी है. और अगर आप उसको कुर्सी का लालच दे दो, तब तो वो हिंदुस्तान की ७ पुश्तो को बेंच देगा. और मीर जाफर क्या था, मीर जाफर ऐसा आदमी था जो रात दिन एक ही सपना देखता था कि एक न एक दिन मुझे बंगाल का नवाब बनना है. और उस ज़माने में बंगाल का नवाब बनना ऐसा ही होता था जैसे आज के ज़माने में बहुत नेता ये सपना देखते है कि मुझे हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री बनना है, चाहे देश बेंचना पड़े. तो मीर जाफर के मन का ये जो लालच था कि मुझे बंगाल का नवाब बनना है. माने कुर्सी चाहिए, और मुझे पूंजी चाहिए, पैसा चाहिए, सत्ता चाहिए और पैसा चाहिए. ये दोनो लालच उस समय मीर जाफर के मन में सबसे ज्यादा प्रबल थे, तो उस लालच को रोबर्ट क्लाइव ने बराबर भांप लिया. तो रोबर्ट क्लाइव ने मीर जाफर को चिट्ठी लिखी है. वो चिट्ठी दस्तावेजो में मौजूद है और उसकी फोटोकोपी मेरे पास है. उसने चिट्ठी में दो ही बातें लिखी है, देखो मीर जाफर अगर तुम अंग्रेजो के साथ दोस्ती करोगे, और ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ समझौता करोगे, तो हम तुमको युद्ध जीतने के बाद बंगाल का नवाब बनाएँगे. और दूसरी बात कि जब आप बंगाल के नवाब हो जाओगे तो सारी की सारी सम्पत्ति आपकी हो जाएगी. इस सम्पत्ति में से ५ टका हमको दे देना, बाकि तुम जितना लूटना चाहो लुट लो. मीर जाफर चूँकि रात दिन ये ही सपना देखता था कि किसी तरह कुर्सी मिल जाए, और किसी तरह पैसा मिल जाए, तुरंत उसने वापस रोबर्ट क्लाइव को चिट्ठी लिखी और उसने कहा कि मुझे आपकी दोनों बातें मंजूर है. बताईए करना क्या है ? तो आखरी चिट्ठी लिखी है रोबर्ट क्लाइव ने मीर जाफर को कि आपको सिर्फ इतना करना है कि युद्ध जिस दिन शुरु होगा, उस दिन आप अपने १८,००० सिपाहियो को कहिए की वो मेरे सामने सरेंडर कर दें बिना लड़े. मीर जाफर ने कहा कि आप अपनी बात पे कायम रहोगे ? मुझे नवाब बनाना है आपको. तो रोबर्ट ने कहा कि बराबर हम अपनी बात पे कायम है, आपको हम बंगाल का नवाब बना देंगे. बस आप एक ही काम करो कि अपनी आर्मी से कहो, क्योकि वो सेनापति था आर्मी का, तो आप अपनी आर्मी को आदेश दो कि युद्ध के मैदान में वो मेरे सामने हथियार डाल दे, बिना लड़े, मीर जाफर ने कहा कि ऐसा ही होगा. और युद्ध शुरु हुआ २३ जून १७५७ को. इतिहास की जानकारी के अनुसार २३ जून १७५७ को युद्ध शुरु होने के ४० मिनट के अंदर भारतवर्ष के १८,००० सिपाहियो ने मीर जाफर के कहने पर अंग्रेजो के ३०० सिपाहियो के सामने सरेंडर कर दिया.
रोबर्ट क्लाइव ने क्या किया कि अपने ३०० सिपाहियो की मदद से हिंदुस्तान के १८,००० सिपाहियो को बंदी बनाया, और कलकत्ता में एक जगह है उसका नाम है फोर्ट विलियम, आज भी है, कभी आप जाइए, उसको देखीए. उस फोर्ट विलियम में १८,००० सिपाहियो को बंदी बना कर ले गया. १० दिन तक उसने भारतीय सिपाहियो को भूखा रखा और उसके बाद ग्यारहवे दिन सबकी हत्या कराई. और उस हत्या कराने में मीर जाफ़र रोबर्ट क्लाइव के साथ शामिल था, उसके बाद रोबर्ट क्लाइव ने क्या किया, उसने बंगाल के नवाब सिराजुद्दोला की हत्या कराई मुर्शिदाबाद में, क्योकि उस जमाने में बंगाल की राजधानी मुर्शिदाबाद होती थी, कलकत्ता नही. सिराजुद्दोला की हत्या कराने में रोबर्ट क्लाइव और मीर जाफ़र दोनों शामिल थे. और नतीजा क्या हुआ ? बंगाल का नवाब सिराजुद्दोला मारा गया, ईस्ट इंडिया कंपनी को भागने का सपना देखता था इस देश में वो मारा गया, और जो ईस्ट इंडिया कंपनी से दोस्ती करने की बात करता था वो बंगाल का नवाब हो गया, मीर जाफ़र. इस पुरे इतिहास की दुर्घटना को मै एक विशेष नजर से देखता हु. मै कई बार ऐसा सोंचता हु कि क्या मीर जाफ़र को मालूम नहीं था कि ईस्ट इंडिया कंपनी से दोस्ती करेंगे तो इस देश की गुलामी आएगी ? मिर जाफ़र जानता था इस बात को. मीर जाफ़र बराबर जानता था कि मै मेरे कुर्सी के लालच में जो खेल खेल रहा हु उस खेल में इस देश को सैंकड़ो वर्षो की गुलामी आ सकती है. ये वो जनता था. और ये भी जानता था कि अपने स्वार्थ में, अपने लालच में मै जो गद्दारी करने जा रहा हु इस देश के साथ उसके क्या दुष्परिणाम होंगे, वो भी उसको मालूम थे.
मै ऐसा सोंचता हु कि हम गुलामी से आजाद हो जाते, क्योकि १८,००० सिपाही हमारे पास थे और ३०० अंग्रेज सिपाहियो को मारना बिलकुल आसन काम था हमारे लिए. हम १७५७ में ही अंग्रेजो की गुलामी से आजाद हो जाते एक बात और दूसरी बात ये जो २०० वर्षो की गुलामी हमको झेलनी पड़ी १७५७ से १९४७ तक, और उस २०० वर्ष की गुलामी को भागने के लिए ६ लाख लोगों की जो क़ुरबानीयां हमको देनी पड़ी, वो बच गया होता. भगत सिंह, चंद्रशेखर, उधम सिंह, तांत्या टोपे, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, सुभाष चन्द्र बोस, ऐसे ऐसे नौजवानों की कुर्बानिया दी है ये कोई छोटे मोटे लोग नहीं थे. सुभाष चन्द्र बोस तो आईपीएस टोपर थे, उधम सिंह चाहता तो ऐयासी कर सकता था, बड़े बाप का बेटा था. भगत सिंह और चंद्रशेखर की भी यही हैसियत थी. चाहते तो जिन्दगी की, जवानी की रंगरलियां मानते और अपनी नौजवानी को ऐसे फंदे में नहीं फ़साते. ये सारे वो नौजवान थें जिनका खून इस देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण था. ६ लाख ऐसे नौजवानों की कुर्बानियां जो हमने दी, वो नहीं देनी पड़ती. और अंग्रेजो की जो यातनाए सही, जो अपमान हमने बर्दास्त किया, वो नहीं करना पड़ता अगर एक आदमी नहीं होता, मीर जाफ़र. लेकिन चूँकि मीर जाफ़र था, मीर जाफ़र का लालच था, कुर्सी का और पैसे का, उस लालच ने इस देश को २०० वर्ष के लिए गुलाम बना दिया.
आज तो देश मैं बहुत से मीर जाफर है ....
जय बाबा बनारस....
Friday, December 27, 2013
अवसर बड़ा या छोटा नही होता है
एक बार एक ग्राहक चित्रो की दुकान पर गया । उसने
वहाँ पर अजीब
से चित्र देखे । पहले चित्र मे चेहरा पूरी तरह बालो से
ढँका हुआ था और पैरोँ मे पंख थे ।एक दूसरे चित्र मे सिर
पीछे से गंजा था।
ग्राहक ने पूछा – यह चित्र किसका है?
दुकानदार ने कहा – अवसर का ।
ग्राहक ने पूछा – इसका चेहरा बालो से ढका क्यो है?
दुकानदार ने कहा -क्योंकि अक्सर जब अवसर आता है
तो मनुष्य उसे पहचानता नही है ।
ग्राहक ने पूछा – और इसके पैरो मे पंख क्यो है?
दुकानदार ने कहा – वह इसलिये कि यह तुरंत वापस
भाग जाता है, यदि इसका उपयोग न हो तो यह तुरंत
उड़ जाता है ।
ग्राहक ने पूछा – और यह दूसरे चित्र मे पीछे से
गंजा सिर किसका है?
दुकानदार ने कहा – यह भी अवसर का है ।
यदि अवसर को सामने से ही बालो से पकड़ लेँगे तो वह
आपका है ।अगर आपने उसे थोड़ी देरी से पकड़ने
की कोशिश की तो पीछे का गंजा सिर हाथ आयेगा और
वो फिसलकर निकल जायेगा । वह ग्राहक इन
चित्रो का रहस्य जानकर हैरान था पर अब वह बात
समझ चुका था ।
दोस्तो,
आपने कई बार दूसरो को ये कहते हुए
सुना होगा या खुद भी कहा होगा कि ’हमे अवसर
ही नही मिला’ लेकिन ये अपनी जिम्मेदारी से भागने
और अपनी गलती को छुपाने का बस एक बहाना है ।
असल मे भगवान ने हमे ढेरो अवसरो के बीच जन्म
दिया है । अवसर हमेशा हमारे सामने से आते जाते
रहते है पर हम उसे पहचान नही पाते या पहचानने मे
देर कर देते है । और कई बार हम सिर्फ इसलिये चूक
जाते है क्योकि हम बड़े अवसर के ताक मे रहते हैं ।
पर अवसर बड़ा या छोटा नही होता है । हमे हर अवसर
का भरपूर उपयोग करना चाहिये ....
जय बाबा बनारस....
वहाँ पर अजीब
से चित्र देखे । पहले चित्र मे चेहरा पूरी तरह बालो से
ढँका हुआ था और पैरोँ मे पंख थे ।एक दूसरे चित्र मे सिर
पीछे से गंजा था।
ग्राहक ने पूछा – यह चित्र किसका है?
दुकानदार ने कहा – अवसर का ।
ग्राहक ने पूछा – इसका चेहरा बालो से ढका क्यो है?
दुकानदार ने कहा -क्योंकि अक्सर जब अवसर आता है
तो मनुष्य उसे पहचानता नही है ।
ग्राहक ने पूछा – और इसके पैरो मे पंख क्यो है?
दुकानदार ने कहा – वह इसलिये कि यह तुरंत वापस
भाग जाता है, यदि इसका उपयोग न हो तो यह तुरंत
उड़ जाता है ।
ग्राहक ने पूछा – और यह दूसरे चित्र मे पीछे से
गंजा सिर किसका है?
दुकानदार ने कहा – यह भी अवसर का है ।
यदि अवसर को सामने से ही बालो से पकड़ लेँगे तो वह
आपका है ।अगर आपने उसे थोड़ी देरी से पकड़ने
की कोशिश की तो पीछे का गंजा सिर हाथ आयेगा और
वो फिसलकर निकल जायेगा । वह ग्राहक इन
चित्रो का रहस्य जानकर हैरान था पर अब वह बात
समझ चुका था ।
दोस्तो,
आपने कई बार दूसरो को ये कहते हुए
सुना होगा या खुद भी कहा होगा कि ’हमे अवसर
ही नही मिला’ लेकिन ये अपनी जिम्मेदारी से भागने
और अपनी गलती को छुपाने का बस एक बहाना है ।
असल मे भगवान ने हमे ढेरो अवसरो के बीच जन्म
दिया है । अवसर हमेशा हमारे सामने से आते जाते
रहते है पर हम उसे पहचान नही पाते या पहचानने मे
देर कर देते है । और कई बार हम सिर्फ इसलिये चूक
जाते है क्योकि हम बड़े अवसर के ताक मे रहते हैं ।
पर अवसर बड़ा या छोटा नही होता है । हमे हर अवसर
का भरपूर उपयोग करना चाहिये ....
जय बाबा बनारस....
Thursday, October 17, 2013
हम सेक्युलर ....है
अपनी संस्कृति को विकृत बनाने के लिए सबसे पहला हमला हम हिन्दू ही करते हैं .. जिससे लोग हमको समझदार और बुद्धिजीवी कह सकें....किसी भी संत.. अथवा पूज्य पर नकारात्मक टिप्पड़ी करने वाले कृपया पहले सभी तथ्यों को जान लें.. तब अपना ज्ञान बघारें.. और मजे की बात ये है कि यहीं बुद्धिजीवी जमीन के अन्दर दबे हुए एक सड़े हुए शव की मजार पर मत्था टेकते दिखाई देते हैं ..
सबसे पहले कुछ सेक्युलर कीड़े इस काम की सुरुआत करते है और बाद मैं अपने ही धरम और धरम के लोगो की बुराई करते है अगर सेक्युलर कीड़ो को हिन्दू धरम इतना ही बुरा लगता है तो अपना धरम बदल कर जो धरम उनको अच्छा लगत है उस धरम को अपना कर फिर उस धरम की बुराई करे ....उस दिन पता लगेगा की हिन्दू धरम कितना बुरा है .....
हम सेक्युलर नहीं है ...
जय बाबा बनारस ....
सबसे पहले कुछ सेक्युलर कीड़े इस काम की सुरुआत करते है और बाद मैं अपने ही धरम और धरम के लोगो की बुराई करते है अगर सेक्युलर कीड़ो को हिन्दू धरम इतना ही बुरा लगता है तो अपना धरम बदल कर जो धरम उनको अच्छा लगत है उस धरम को अपना कर फिर उस धरम की बुराई करे ....उस दिन पता लगेगा की हिन्दू धरम कितना बुरा है .....
हम सेक्युलर नहीं है ...
जय बाबा बनारस ....
Wednesday, October 9, 2013
“हलाल” का माँस न खाने से उनकी धार्मिक मान्यतायें प्रभावित होती हैं।
भारत के मुसलमानों आजकल किस %मैं है ....और यहाँ का मुसलमान सही तरह से पाने धरम का पालन कर रहा है की नहीं ......
मुस्लिम पोपुलेशन- --जब तक मुस्लिमों की जनसंख्या किसी देश/प्रदेश/क्षेत्र में लगभग 2% के आसपास होती है, तब वे एकदम शांतिप्रिय, कानूनपसन्द अल्पसंख्यक बनकर रहते हैं और किसी को विशेष शिकायत का मौका नहीं देते, जैसे -
अमेरिका – मुस्लिम 0.6%
ऑस्ट्रेलिया – मुस्लिम 1.5%
कनाडा – मुस्लिम 1.9%
चीन – मुस्लिम 1.8%
इटली – मुस्लिम 1.5%
नॉर्वे – मुस्लिम 1.8%
जब मुस्लिम जनसंख्या 2% से 5% के बीच तक पहुँच जाती है, तब वे अन्य धर्मावलम्बियों में अपना “धर्मप्रचार” शुरु कर देते हैं, जिनमें अक्सर समाज का निचला तबका और अन्य धर्मों से असंतुष्ट हुए लोग होते हैं, जैसे कि –
डेनमार्क – मुस्लिम 2%
जर्मनी – मुस्लिम 3.7%
ब्रिटेन – मुस्लिम 2.7%
स्पेन – मुस्लिम 4%
थाईलैण्ड – मुस्लिम 4.6%
मुस्लिम जनसंख्या के 5% से ऊपर हो जाने पर वे अपने अनुपात के हिसाब से अन्य धर्मावलम्बियों पर दबाव बढ़ाने लगते हैं और अपना “प्रभाव” जमाने की कोशिश करने लगते हैं। उदाहरण के लिये वे सरकारों और शॉपिंग मॉल पर “हलाल” का माँस रखने का दबाव बनाने लगते हैं, वे कहते हैं कि “हलाल” का माँस न खाने से उनकी धार्मिक मान्यतायें प्रभावित होती हैं। इस कदम से कई पश्चिमी देशों में “खाद्य वस्तुओं” के बाजार में मुस्लिमों की तगड़ी पैठ बनी। उन्होंने कई देशों के सुपरमार्केट के मालिकों को दबाव डालकर अपने यहाँ “हलाल” का माँस रखने को बाध्य किया। दुकानदार भी “धंधे” को देखते हुए उनका कहा मान लेता है (अधिक जनसंख्या होने का “फ़ैक्टर” यहाँ से मजबूत होना शुरु हो जाता है), ऐसा जिन देशों में हो चुका वह हैं –
फ़्रांस – मुस्लिम 8%
फ़िलीपीन्स – मुस्लिम 6%
स्वीडन – मुस्लिम 5.5%
स्विटजरलैण्ड – मुस्लिम 5.3%
नीडरलैण्ड – मुस्लिम 5.8%
त्रिनिदाद और टोबैगो – मुस्लिम 6%
इस बिन्दु पर आकर “मुस्लिम” सरकारों पर यह दबाव बनाने लगते हैं कि उन्हें उनके “क्षेत्रों” में शरीयत कानून (इस्लामिक कानून) के मुताबिक चलने दिया जाये (क्योंकि उनका अन्तिम लक्ष्य तो यही है कि समूचा विश्व “शरीयत” कानून के हिसाब से चले)। जब मुस्लिम जनसंख्या 10% से अधिक हो जाती है तब वे उस देश/प्रदेश/राज्य/क्षेत्र विशेष में कानून-व्यवस्था के लिये परेशानी पैदा करना शुरु कर देते हैं, शिकायतें करना शुरु कर देते हैं, उनकी “आर्थिक परिस्थिति” का रोना लेकर बैठ जाते हैं, छोटी-छोटी बातों को सहिष्णुता से लेने की बजाय दंगे, तोड़फ़ोड़ आदि पर उतर आते हैं, चाहे वह फ़्रांस के दंगे हों, डेनमार्क का कार्टून विवाद हो, या फ़िर एम्स्टर्डम में कारों का जलाना हो, हरेक विवाद को समझबूझ, बातचीत से खत्म करने की बजाय खामख्वाह और गहरा किया जाता है, जैसे कि –
गुयाना – मुस्लिम 10%
इसराइल – मुस्लिम 16%
केन्या – मुस्लिम 11%
रूस – मुस्लिम 15% (चेचन्या – मुस्लिम आबादी 70%)
जब मुस्लिम जनसंख्या 20% से ऊपर हो जाती है तब विभिन्न “सैनिक शाखायें” जेहाद के नारे लगाने लगती हैं, असहिष्णुता और धार्मिक हत्याओं का दौर शुरु हो जाता है, जैसे-
इथियोपिया – मुस्लिम 32.8%
भारत – मुस्लिम 22%
मुस्लिम जनसंख्या के 40% के स्तर से ऊपर पहुँच जाने पर बड़ी संख्या में सामूहिक हत्याऐं, आतंकवादी कार्रवाईयाँ आदि चलने लगते हैं, जैसे –
बोस्निया – मुस्लिम 40%
चाड – मुस्लिम 54.2%
लेबनान – मुस्लिम 59%
जब मुस्लिम जनसंख्या 60% से ऊपर हो जाती है तब अन्य धर्मावलंबियों का “जातीय सफ़ाया” शुरु किया जाता है (उदाहरण भारत का कश्मीर), जबरिया मुस्लिम बनाना, अन्य धर्मों के धार्मिक स्थल तोड़ना, जजिया जैसा कोई अन्य कर वसूलना आदि किया जाता है, जैसे –
अल्बानिया – मुस्लिम 70%
मलेशिया – मुस्लिम 62%
कतर – मुस्लिम 78%
सूडान – मुस्लिम 75%
जनसंख्या के 80% से ऊपर हो जाने के बाद तो सत्ता/शासन प्रायोजित जातीय सफ़ाई की जाती है, अन्य धर्मों के अल्पसंख्यकों को उनके मूल नागरिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया जाता है, सभी प्रकार के हथकण्डे/हथियार अपनाकर जनसंख्या को 100% तक ले जाने का लक्ष्य रखा जाता है, जैसे –
बांग्लादेश – मुस्लिम 83%
मिस्त्र – मुस्लिम 90%
गाज़ा पट्टी – मुस्लिम 98%
ईरान – मुस्लिम 98%
ईराक – मुस्लिम 97%
जोर्डन – मुस्लिम 93%
मोरक्को – मुस्लिम 98%
पाकिस्तान – मुस्लिम 97%
सीरिया – मुस्लिम 90%
संयुक्त अरब अमीरात – मुस्लिम 96%
बनती कोशिश पूरी 100% जनसंख्या मुस्लिम बन जाने, यानी कि दार-ए-स्सलाम होने की स्थिति में वहाँ सिर्फ़ मदरसे होते हैं और सिर्फ़ कुरान पढ़ाई जाती है और उसे ही अन्तिम सत्य माना जाता है, जैसे –
अफ़गानिस्तान – मुस्लिम 100%
सऊदी अरब – मुस्लिम 100%
सोमालिया – मुस्लिम 100%a
यमन – मुस्लिम 100%
आज की स्थिति में मुस्लिमों की जनसंख्या समूचे विश्व की जनसंख्या का 22-24% है, लेकिन ईसाईयों, हिन्दुओं और यहूदियों के मुकाबले उनकी जन्मदर को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस शताब्दी के अन्त से पहले ही मुस्लिम जनसंख्या विश्व की 50% हो जायेगी (यदि तब तक धरती बची तो)… भारत में कुल मुस्लिम जनसंख्या 15% के आसपास मानी जाती है, जबकि हकीकत यह है कि उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और केरल के कई जिलों में यह आँकड़ा 60 से 80% तक पहुँच चुका है… अब देश में आगे चलकर क्या परिस्थितियाँ बनेंगी यह कोई भी (“सेकुलरों” को छोड़कर) आसानी से सोच-समझ सकता है…
(सभी सन्दर्भ और आँकड़े : डॉ पीटर हैमण्ड की पुस्तक “स्लेवरी, टेररिज़्म एण्ड इस्लाम – द हिस्टोरिकल रूट्स एण्ड कण्टेम्पररी थ्रेट तथा लियोन यूरिस – “द हज”, से साभार)
मुस्लिम पोपुलेशन- --जब तक मुस्लिमों की जनसंख्या किसी देश/प्रदेश/क्षेत्र में लगभग 2% के आसपास होती है, तब वे एकदम शांतिप्रिय, कानूनपसन्द अल्पसंख्यक बनकर रहते हैं और किसी को विशेष शिकायत का मौका नहीं देते, जैसे -
अमेरिका – मुस्लिम 0.6%
ऑस्ट्रेलिया – मुस्लिम 1.5%
कनाडा – मुस्लिम 1.9%
चीन – मुस्लिम 1.8%
इटली – मुस्लिम 1.5%
नॉर्वे – मुस्लिम 1.8%
जब मुस्लिम जनसंख्या 2% से 5% के बीच तक पहुँच जाती है, तब वे अन्य धर्मावलम्बियों में अपना “धर्मप्रचार” शुरु कर देते हैं, जिनमें अक्सर समाज का निचला तबका और अन्य धर्मों से असंतुष्ट हुए लोग होते हैं, जैसे कि –
डेनमार्क – मुस्लिम 2%
जर्मनी – मुस्लिम 3.7%
ब्रिटेन – मुस्लिम 2.7%
स्पेन – मुस्लिम 4%
थाईलैण्ड – मुस्लिम 4.6%
मुस्लिम जनसंख्या के 5% से ऊपर हो जाने पर वे अपने अनुपात के हिसाब से अन्य धर्मावलम्बियों पर दबाव बढ़ाने लगते हैं और अपना “प्रभाव” जमाने की कोशिश करने लगते हैं। उदाहरण के लिये वे सरकारों और शॉपिंग मॉल पर “हलाल” का माँस रखने का दबाव बनाने लगते हैं, वे कहते हैं कि “हलाल” का माँस न खाने से उनकी धार्मिक मान्यतायें प्रभावित होती हैं। इस कदम से कई पश्चिमी देशों में “खाद्य वस्तुओं” के बाजार में मुस्लिमों की तगड़ी पैठ बनी। उन्होंने कई देशों के सुपरमार्केट के मालिकों को दबाव डालकर अपने यहाँ “हलाल” का माँस रखने को बाध्य किया। दुकानदार भी “धंधे” को देखते हुए उनका कहा मान लेता है (अधिक जनसंख्या होने का “फ़ैक्टर” यहाँ से मजबूत होना शुरु हो जाता है), ऐसा जिन देशों में हो चुका वह हैं –
फ़्रांस – मुस्लिम 8%
फ़िलीपीन्स – मुस्लिम 6%
स्वीडन – मुस्लिम 5.5%
स्विटजरलैण्ड – मुस्लिम 5.3%
नीडरलैण्ड – मुस्लिम 5.8%
त्रिनिदाद और टोबैगो – मुस्लिम 6%
इस बिन्दु पर आकर “मुस्लिम” सरकारों पर यह दबाव बनाने लगते हैं कि उन्हें उनके “क्षेत्रों” में शरीयत कानून (इस्लामिक कानून) के मुताबिक चलने दिया जाये (क्योंकि उनका अन्तिम लक्ष्य तो यही है कि समूचा विश्व “शरीयत” कानून के हिसाब से चले)। जब मुस्लिम जनसंख्या 10% से अधिक हो जाती है तब वे उस देश/प्रदेश/राज्य/क्षेत्र विशेष में कानून-व्यवस्था के लिये परेशानी पैदा करना शुरु कर देते हैं, शिकायतें करना शुरु कर देते हैं, उनकी “आर्थिक परिस्थिति” का रोना लेकर बैठ जाते हैं, छोटी-छोटी बातों को सहिष्णुता से लेने की बजाय दंगे, तोड़फ़ोड़ आदि पर उतर आते हैं, चाहे वह फ़्रांस के दंगे हों, डेनमार्क का कार्टून विवाद हो, या फ़िर एम्स्टर्डम में कारों का जलाना हो, हरेक विवाद को समझबूझ, बातचीत से खत्म करने की बजाय खामख्वाह और गहरा किया जाता है, जैसे कि –
गुयाना – मुस्लिम 10%
इसराइल – मुस्लिम 16%
केन्या – मुस्लिम 11%
रूस – मुस्लिम 15% (चेचन्या – मुस्लिम आबादी 70%)
जब मुस्लिम जनसंख्या 20% से ऊपर हो जाती है तब विभिन्न “सैनिक शाखायें” जेहाद के नारे लगाने लगती हैं, असहिष्णुता और धार्मिक हत्याओं का दौर शुरु हो जाता है, जैसे-
इथियोपिया – मुस्लिम 32.8%
भारत – मुस्लिम 22%
मुस्लिम जनसंख्या के 40% के स्तर से ऊपर पहुँच जाने पर बड़ी संख्या में सामूहिक हत्याऐं, आतंकवादी कार्रवाईयाँ आदि चलने लगते हैं, जैसे –
बोस्निया – मुस्लिम 40%
चाड – मुस्लिम 54.2%
लेबनान – मुस्लिम 59%
जब मुस्लिम जनसंख्या 60% से ऊपर हो जाती है तब अन्य धर्मावलंबियों का “जातीय सफ़ाया” शुरु किया जाता है (उदाहरण भारत का कश्मीर), जबरिया मुस्लिम बनाना, अन्य धर्मों के धार्मिक स्थल तोड़ना, जजिया जैसा कोई अन्य कर वसूलना आदि किया जाता है, जैसे –
अल्बानिया – मुस्लिम 70%
मलेशिया – मुस्लिम 62%
कतर – मुस्लिम 78%
सूडान – मुस्लिम 75%
जनसंख्या के 80% से ऊपर हो जाने के बाद तो सत्ता/शासन प्रायोजित जातीय सफ़ाई की जाती है, अन्य धर्मों के अल्पसंख्यकों को उनके मूल नागरिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया जाता है, सभी प्रकार के हथकण्डे/हथियार अपनाकर जनसंख्या को 100% तक ले जाने का लक्ष्य रखा जाता है, जैसे –
बांग्लादेश – मुस्लिम 83%
मिस्त्र – मुस्लिम 90%
गाज़ा पट्टी – मुस्लिम 98%
ईरान – मुस्लिम 98%
ईराक – मुस्लिम 97%
जोर्डन – मुस्लिम 93%
मोरक्को – मुस्लिम 98%
पाकिस्तान – मुस्लिम 97%
सीरिया – मुस्लिम 90%
संयुक्त अरब अमीरात – मुस्लिम 96%
बनती कोशिश पूरी 100% जनसंख्या मुस्लिम बन जाने, यानी कि दार-ए-स्सलाम होने की स्थिति में वहाँ सिर्फ़ मदरसे होते हैं और सिर्फ़ कुरान पढ़ाई जाती है और उसे ही अन्तिम सत्य माना जाता है, जैसे –
अफ़गानिस्तान – मुस्लिम 100%
सऊदी अरब – मुस्लिम 100%
सोमालिया – मुस्लिम 100%a
यमन – मुस्लिम 100%
आज की स्थिति में मुस्लिमों की जनसंख्या समूचे विश्व की जनसंख्या का 22-24% है, लेकिन ईसाईयों, हिन्दुओं और यहूदियों के मुकाबले उनकी जन्मदर को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस शताब्दी के अन्त से पहले ही मुस्लिम जनसंख्या विश्व की 50% हो जायेगी (यदि तब तक धरती बची तो)… भारत में कुल मुस्लिम जनसंख्या 15% के आसपास मानी जाती है, जबकि हकीकत यह है कि उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और केरल के कई जिलों में यह आँकड़ा 60 से 80% तक पहुँच चुका है… अब देश में आगे चलकर क्या परिस्थितियाँ बनेंगी यह कोई भी (“सेकुलरों” को छोड़कर) आसानी से सोच-समझ सकता है…
(सभी सन्दर्भ और आँकड़े : डॉ पीटर हैमण्ड की पुस्तक “स्लेवरी, टेररिज़्म एण्ड इस्लाम – द हिस्टोरिकल रूट्स एण्ड कण्टेम्पररी थ्रेट तथा लियोन यूरिस – “द हज”, से साभार)
Sunday, August 11, 2013
तिलक का महत्व
शायद भारत के सिवा और कहीं भी मस्तक पर तिलक लगाने की प्रथा प्रचलित नहीं है। यह रिवाज अत्यंत प्राचीन है। माना जाता है कि मनुष्य के मस्तक के मध्य में विष्णु भगवान का निवास होता है, और तिलक ठीक इसी स्थान पर लगाया जाता है।
मनोविज्ञान की दृष्टि से भी तिलक लगाना उपयोगी माना गया है। माथा चेहरे का केंद्रीय भाग होता है, जहां सबकी नजर अटकती है। उसके मध्य में
तिलक लगाकर, विशेषकर स्त्रियों में, देखने वाले की दृष्टि को बांधे रखने का प्रयत्न किया जाता है।
स्त्रियां लाल कुंकुम का तिलक लगाती हैं। यह भी बिना प्रयोजन नहीं है। लाल रंग ऊर्जा एवं स्फूर्ति का प्रतीक होता है। तिलक स्त्रियों के सौंदर्य में अभिवृद्धि करता है। तिलक लगाना देवी की आराधना से भी जुड़ा है। देवी की पूजा करने के बाद माथे पर तिलक लगाया जाता है। तिलक देवी के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।
तिलक का महत्व
हिन्दु परम्परा में मस्तक पर तिलक लगाना शूभ माना जाता है इसे सात्विकता का प्रतीक माना जाता है विजयश्री प्राप्त करने के उद्देश्य रोली, हल्दी, चन्दन या फिर कुम्कुम का तिलक या कार्य की महत्ता को ध्यान में रखकर, इसी प्रकार शुभकामनाओं के रुप में हमारे तीर्थस्थानों पर, विभिन्न पर्वो-त्यौहारों, विशेष अतिथि आगमन पर आवाजाही के उद्देश्य से भी लगाया जाता है ।
मस्तिष्क के भ्रु-मध्य ललाट में जिस स्थान पर टीका या तिलक लगाया जाता है यह भाग आज्ञाचक्र है । शरीर शास्त्र के अनुसार पीनियल ग्रन्थि का स्थान होने की वजह से, जब पीनियल ग्रन्थि को उद्दीप्त किया जाता हैं, तो मस्तष्क के अन्दर एक तरह के प्रकाश की अनुभूति होती है । इसे प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है हमारे ऋषिगण इस बात को भलीभाँति जानते थे पीनियल ग्रन्थि के उद्दीपन से आज्ञाचक्र का उद्दीपन होगा । इसी वजह से धार्मिक कर्मकाण्ड, पूजा-उपासना व शूभकार्यो में टीका लगाने का प्रचलन से बार-बार उस के उद्दीपन से हमारे शरीर में स्थूल-सूक्ष्म अवयन जागृत हो सकें । इस आसान तरीके से सर्वसाधारण की रुचि धार्मिकता की ओर, आत्मिकता की ओर, तृतीय नेत्र जानकर इसके उन्मीलन की दिशा में किया गयचा प्रयास जिससे आज्ञाचक्र को नियमित उत्तेजना मिलती रहती है ।
तन्त्र शास्त्र के अनुसार माथे को इष्ट इष्ट देव का प्रतीक समझा जाता है हमारे इष्ट देव की स्मृति हमें सदैव बनी रहे इस तरह की धारणा क ध्यान में रखकर, ताकि मन में उस केन्द्रबिन्दु की स्मृति हो सकें । शरीर व्यापी चेतना शनैः शनैः आज्ञाचक्र पर एकत्रित होती रहे । चुँकि चेतना सारे शरीर में फैली रहती है । अतः इसे तिलक या टीके के माधअयम से आज्ञाचक्र पर एकत्रित कर, तीसरे नेत्र को जागृत करा सकें ताकि हम परामानसिक जगत में प्रवेश कर सकें ।
तिलक का हमारे जीवन में कितना महत्व है शुभघटना से लेकर अन्य कई धार्मिक अनुष्ठानों, संस्कारों, युद्ध लडने जाने वाले को शुभकामनाँ के तौर पर तिलक लगाया जाता है वे प्रसंग जिन्हें हम हमारी स्मृति-पटल से हटाना नही चाहते इन शुशियों को मस्तिष्क में स्थआई तौर पर रखने, शुभ-प्रसंगों इत्यादि के लिए तिलक लगाया जाता है हमारे जीवन में तिलक का बडा महत्व है तत्वदर्शन व विज्ञान भी इसके प्रचलन को शिक्षा को बढाने व हमारे हमारे जीवन सरल व सार्थकता उतारने के जरुरत है ?।
तिलक हिंदू संस्कृति में एक पहचान चिन्ह का काम करता है। तिलक केवल धार्मिक मान्यता नहीं है बल्कि कई वैज्ञानिक कारण भी हैं इसके पीछे। तिलक केवल एक तरह से नहीं लगाया जाता। हिंदू धर्म में जितने संतों के मत हैं, जितने पंथ है, संप्रदाय हैं उन सबके अपने अलग-अलग तिलक होते हैं।
एक मित्र की फेसबुक की वाल से साभार .....
जय बाबा बनारस......
मनोविज्ञान की दृष्टि से भी तिलक लगाना उपयोगी माना गया है। माथा चेहरे का केंद्रीय भाग होता है, जहां सबकी नजर अटकती है। उसके मध्य में
तिलक लगाकर, विशेषकर स्त्रियों में, देखने वाले की दृष्टि को बांधे रखने का प्रयत्न किया जाता है।
स्त्रियां लाल कुंकुम का तिलक लगाती हैं। यह भी बिना प्रयोजन नहीं है। लाल रंग ऊर्जा एवं स्फूर्ति का प्रतीक होता है। तिलक स्त्रियों के सौंदर्य में अभिवृद्धि करता है। तिलक लगाना देवी की आराधना से भी जुड़ा है। देवी की पूजा करने के बाद माथे पर तिलक लगाया जाता है। तिलक देवी के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।
तिलक का महत्व
हिन्दु परम्परा में मस्तक पर तिलक लगाना शूभ माना जाता है इसे सात्विकता का प्रतीक माना जाता है विजयश्री प्राप्त करने के उद्देश्य रोली, हल्दी, चन्दन या फिर कुम्कुम का तिलक या कार्य की महत्ता को ध्यान में रखकर, इसी प्रकार शुभकामनाओं के रुप में हमारे तीर्थस्थानों पर, विभिन्न पर्वो-त्यौहारों, विशेष अतिथि आगमन पर आवाजाही के उद्देश्य से भी लगाया जाता है ।
मस्तिष्क के भ्रु-मध्य ललाट में जिस स्थान पर टीका या तिलक लगाया जाता है यह भाग आज्ञाचक्र है । शरीर शास्त्र के अनुसार पीनियल ग्रन्थि का स्थान होने की वजह से, जब पीनियल ग्रन्थि को उद्दीप्त किया जाता हैं, तो मस्तष्क के अन्दर एक तरह के प्रकाश की अनुभूति होती है । इसे प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है हमारे ऋषिगण इस बात को भलीभाँति जानते थे पीनियल ग्रन्थि के उद्दीपन से आज्ञाचक्र का उद्दीपन होगा । इसी वजह से धार्मिक कर्मकाण्ड, पूजा-उपासना व शूभकार्यो में टीका लगाने का प्रचलन से बार-बार उस के उद्दीपन से हमारे शरीर में स्थूल-सूक्ष्म अवयन जागृत हो सकें । इस आसान तरीके से सर्वसाधारण की रुचि धार्मिकता की ओर, आत्मिकता की ओर, तृतीय नेत्र जानकर इसके उन्मीलन की दिशा में किया गयचा प्रयास जिससे आज्ञाचक्र को नियमित उत्तेजना मिलती रहती है ।
तन्त्र शास्त्र के अनुसार माथे को इष्ट इष्ट देव का प्रतीक समझा जाता है हमारे इष्ट देव की स्मृति हमें सदैव बनी रहे इस तरह की धारणा क ध्यान में रखकर, ताकि मन में उस केन्द्रबिन्दु की स्मृति हो सकें । शरीर व्यापी चेतना शनैः शनैः आज्ञाचक्र पर एकत्रित होती रहे । चुँकि चेतना सारे शरीर में फैली रहती है । अतः इसे तिलक या टीके के माधअयम से आज्ञाचक्र पर एकत्रित कर, तीसरे नेत्र को जागृत करा सकें ताकि हम परामानसिक जगत में प्रवेश कर सकें ।
तिलक का हमारे जीवन में कितना महत्व है शुभघटना से लेकर अन्य कई धार्मिक अनुष्ठानों, संस्कारों, युद्ध लडने जाने वाले को शुभकामनाँ के तौर पर तिलक लगाया जाता है वे प्रसंग जिन्हें हम हमारी स्मृति-पटल से हटाना नही चाहते इन शुशियों को मस्तिष्क में स्थआई तौर पर रखने, शुभ-प्रसंगों इत्यादि के लिए तिलक लगाया जाता है हमारे जीवन में तिलक का बडा महत्व है तत्वदर्शन व विज्ञान भी इसके प्रचलन को शिक्षा को बढाने व हमारे हमारे जीवन सरल व सार्थकता उतारने के जरुरत है ?।
तिलक हिंदू संस्कृति में एक पहचान चिन्ह का काम करता है। तिलक केवल धार्मिक मान्यता नहीं है बल्कि कई वैज्ञानिक कारण भी हैं इसके पीछे। तिलक केवल एक तरह से नहीं लगाया जाता। हिंदू धर्म में जितने संतों के मत हैं, जितने पंथ है, संप्रदाय हैं उन सबके अपने अलग-अलग तिलक होते हैं।
एक मित्र की फेसबुक की वाल से साभार .....
जय बाबा बनारस......
Tuesday, August 6, 2013
बिना टाइटल के
हमारे जवानों की शहादत पर मन खिन्न है , ये निर्मम हत्या का मामला है / परन्तु एक प्रश्न मन को कचोट रहा है की कैसे पाकिस्तान के फौजी हमारी सीमा के अंदर आ गये और हमारे जवानों को मार भी देते हैं तो फिर हमारी फौज की ट्रेनिंग कैसी कमजोर है की दुश्मन हमारे घर आया और मार के गायब भी हो गया , हमारी फौज क्या सो रही होती है , कैसे कोई घर आ कर मार जाए और हम देखता रह जाएँ , कम से कम दुश्मन को भी कुछ तो आघात होना चाहिए , कहीं ऐसा तो नही कुछ बागी अपनी ही फौज में हो और अपने ही जवानों का कत्ल कर पकिस्तान का नाम उछाल रहे हों .... पता करना पड़ेगा की आज मरने वाले जवान हिन्दू थे या मुसलमान , अगर सिर्फ हिन्दू थे तो जान लेना पड़ेगा की हमारी सेना को अंदर से घुन का कीड़ा लग चुका है जो की बहुत भयानक रूप ले सकता है ....इंटेलीजेंसी डिपार्टमेंट को एलर्ट हो जाना चाहिए....
जय बाबा बनारस........
जय बाबा बनारस........
Monday, August 5, 2013
रोजा -अफ्तार
किसी मुस्लमान या ईसाई को कभी पोस्टरों में भी तिलक लगवा कर
होली, दीपावली, नवरात्रों आदि को शुभकामनायें देते हुए नही देखा...
वास्तविक जीवन में तो असम्भव सी बात है l
सेक्युलर कीड़े रोजा -अफ्तार की पार्टी मैं टोपी लगा के क्या कहना चाहते है जो अपने धरम का न हुआ
जो अपने देश का न हुआ वह क्या होगा यह सब जानते है ...वन्देमातरम
जय बाबा बनारस....
होली, दीपावली, नवरात्रों आदि को शुभकामनायें देते हुए नही देखा...
वास्तविक जीवन में तो असम्भव सी बात है l
सेक्युलर कीड़े रोजा -अफ्तार की पार्टी मैं टोपी लगा के क्या कहना चाहते है जो अपने धरम का न हुआ
जो अपने देश का न हुआ वह क्या होगा यह सब जानते है ...वन्देमातरम
जय बाबा बनारस....
Saturday, August 3, 2013
वन्देमातरम
जो हिन्दू राम का नहीं वो इंसान किसी काम का नहीं
ये ..... "उमर अब्दुल्ला" ने खीर भवानी मंदिर में तिलक लगवाने से इन्कार किया !!
.
मोदी जी द्वारा काफा नही ओढने पर छाती कूट कूट कर सलवार कमीज फाड़ने वाले सेकुलर अब किस गंदे नाले में छुप कर सो रहे हे ।
.....क्या तुम्हारी ये ही धर्म निरपेक्षता हे ?????
जय बाबा बनारस वंदे मातरम॥
ये ..... "उमर अब्दुल्ला" ने खीर भवानी मंदिर में तिलक लगवाने से इन्कार किया !!
.
मोदी जी द्वारा काफा नही ओढने पर छाती कूट कूट कर सलवार कमीज फाड़ने वाले सेकुलर अब किस गंदे नाले में छुप कर सो रहे हे ।
.....क्या तुम्हारी ये ही धर्म निरपेक्षता हे ?????
जय बाबा बनारस वंदे मातरम॥
Thursday, August 1, 2013
वरिष्ठ बुजर्ग
कुछ दिन पहले में एक वरिष्ठ बुजर्ग से बात कर रहा था, मेने उनसे अपने मन की बात कही की भाई साहब ये सेक्युलर क्यों है हिन्दुओ में, तो उन्होंने मेरी बात का जवाब इस प्रकार से दिया ====
" बेटा हमारा देश लगभग 1100 साल विदेशियों के कब्जे में रहा, उस समय कुछ लोगो ने विदेशी आक्रंताओ को जरा से डर से ही अपना मालिक मन लिया था एवं कुछ हिन्दू लगातार उनसे संघर्ष करते रहे जिन्होंने संघर्ष किया वो आज भी हिन्दू ही है लेकिन जिन्होंने विदेशियो को उस समय मानसिक रूप से अपना मालिक मन लिया था उनकी पीढ़ी आज भी विदेशियो के पक्ष में ही बोलती है एवं उनके पक्ष में बोलने को वो स्वयं को सेकुलर कहते है"इसका मतलब जो दर गया करीब करीब बहुत से लोग वही सेक्युलर है
मुझे कुछ बात जमी पता नहीं आपको जमेगी या नहीं
जय बाबा बनारस .....
" बेटा हमारा देश लगभग 1100 साल विदेशियों के कब्जे में रहा, उस समय कुछ लोगो ने विदेशी आक्रंताओ को जरा से डर से ही अपना मालिक मन लिया था एवं कुछ हिन्दू लगातार उनसे संघर्ष करते रहे जिन्होंने संघर्ष किया वो आज भी हिन्दू ही है लेकिन जिन्होंने विदेशियो को उस समय मानसिक रूप से अपना मालिक मन लिया था उनकी पीढ़ी आज भी विदेशियो के पक्ष में ही बोलती है एवं उनके पक्ष में बोलने को वो स्वयं को सेकुलर कहते है"इसका मतलब जो दर गया करीब करीब बहुत से लोग वही सेक्युलर है
मुझे कुछ बात जमी पता नहीं आपको जमेगी या नहीं
जय बाबा बनारस .....
Wednesday, July 24, 2013
नाक कटवा लो नाक
राहुल एकमात्र ऐसे जीवित
राजनेता है जो, जन्मदिन 'लन्दन' में
मनाते है, इलाज न्यूयार्क में कराते है,
'रुपया' स्विट्ज़रलैंड में जमा करते है,
बाल 'स्पेन' में कटते है और सिर्फ
'नाक' कटवाने भारत आते है।
जय बाबा बनारस....
राजनेता है जो, जन्मदिन 'लन्दन' में
मनाते है, इलाज न्यूयार्क में कराते है,
'रुपया' स्विट्ज़रलैंड में जमा करते है,
बाल 'स्पेन' में कटते है और सिर्फ
'नाक' कटवाने भारत आते है।
जय बाबा बनारस....
लाभकारी संस्था
मुसलमानों मैं अपने उपर कण्ट्रोल करने की आदत नहीं है नहीं मानते तो यह आज की खबर इस की पुस्ती करती है पाकिस्तान में टीवी चैनलों पर कंडोम के एक भड़काऊ विज्ञापन के प्रसारण पर
पाबंदी लगा दी गई है. पाबंदी लगाते हुए कहा गया कि इस तरह की ‘अनैतिक’
बातों को रमजान के पवित्र महीने के दौरान प्रसारित नहीं किया जाना चाहिए.
यह विज्ञापन अदाकारा मथीरा पर फिल्माया गया है. पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नियामक प्राधिकरण (पीईएमआरए) ने इस 50 सेकंड के विज्ञापन के ‘अश्लील’ होने के बारे में कई शिकायतें मिलने के बाद इसपर पाबंदी लगा दी. अथॉरिटी के प्रवक्ता फक्र मुगल ने यह जानकारी दी.
उन्होंने मीडिया से कहा, ‘पाकिस्तानी चैनलों पर इस तरह के अनैतिक विज्ञापन का प्रसारण और वह भी रमजान के महीने में, गंभीर कार्रवाई की मांग करता है.’
मुगल ने बताया, ‘टीवी चैनलों ने कंडोम के इस विज्ञापन को प्रसारित नहीं करने का फैसला किया है, क्योंकि यह बहुत अनैतिक है.’
गौरतलब है कि पाकिस्तान में इस कंडोम की मार्केटिंग अमेरिका की एक गैर लाभकारी संस्था करती है, जो परिवार नियोजन और एड्स की रोकथाम के लिए काम करती है.
यह विज्ञापन अदाकारा मथीरा पर फिल्माया गया है. पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नियामक प्राधिकरण (पीईएमआरए) ने इस 50 सेकंड के विज्ञापन के ‘अश्लील’ होने के बारे में कई शिकायतें मिलने के बाद इसपर पाबंदी लगा दी. अथॉरिटी के प्रवक्ता फक्र मुगल ने यह जानकारी दी.
उन्होंने मीडिया से कहा, ‘पाकिस्तानी चैनलों पर इस तरह के अनैतिक विज्ञापन का प्रसारण और वह भी रमजान के महीने में, गंभीर कार्रवाई की मांग करता है.’
मुगल ने बताया, ‘टीवी चैनलों ने कंडोम के इस विज्ञापन को प्रसारित नहीं करने का फैसला किया है, क्योंकि यह बहुत अनैतिक है.’
गौरतलब है कि पाकिस्तान में इस कंडोम की मार्केटिंग अमेरिका की एक गैर लाभकारी संस्था करती है, जो परिवार नियोजन और एड्स की रोकथाम के लिए काम करती है.
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