Monday, July 30, 2012

उससे क्या होगा........

एक युवा हलवाई ने मिठाइयों की एक छोटी सी दुकान खोली। कभी-कभी उसकी दुकान में ग्राहक आते और कभी नहीं। चाहे ग्राहक ज्यादा आएं या कम, किंतु इससे हलवाई की प्रसन्नता में कोई फर्क नहीं पड़ता था। वह ईमानदारी व मेहनत से अपना काम करता रहता था। कुछ ही दिनों में उसकी दुकान पूरे शहर में मशहूर हो गई। उसकी मिठाइयों की घर-घर में चर्चा होने लगी। फिर भी उसने दाम नहीं बढ़ाए।
एक ग्राहक प्रतिदिन उससे रसगुल्ले खरीदता। कुछ ही दिनों में उसकी हलवाई से घनिष्ठता हो गई। मिठाईवाला अब भी पहले की तरह ही शांत व खुश रहता था। एक दिन वह ग्राहक बोला, 'तुम्हारी दुकान कुछ ही समय में अच्छी चल निकली है। तुम इसकी नई शाखा क्यों नहीं खोल लेते?' ग्राहक की बात पर हलवाई मुस्करा कर बोला, 'उससे क्या होगा ?'
ग्राहक बोला, 'अरे भई यदि तुम इस दुकान की एक और शाखा खोल लेते हो तो दूर-दूर तक तुम्हारा नाम होगा और इस तरह तुम्हारी मिठाइयों की मांग सब जगह होने लगेगी।' हलवाई ने मासूमियत से पूछा, 'उससे क्या होगा?' ग्राहक बोला, 'उससे तुम्हारे पास धन-दौलत की बरसात होने लगेगी और तुम धनवान हो जाओगे।'
हलवाई ने कहा, 'उससे क्या होगा?' यह सुनकर ग्राहक को गुस्सा आ गया और वह खीझकर बोला, 'अरे भैया, तुम तो निरे बेवकूफ मालूम होते हो। जब तुम्हारा व्यापार दिन-दूनी रात चौगुनी उन्नति करेगा, तुम पर रुपयों की बरसात होगी तो तुम अपने जीवन में अधिक खुश रह सकोगे।' हलवाई ने कहा, 'वो तो मैं अब भी हूं।' ग्राहक हलवाई का जवाब सुनकर दंग रह गया। उसे हैरानी की मुद्रा में देखकर हलवाई बोला, 'धन से व्यक्ति कभी सुखी नहीं होता। जिनके पास अधिक धन है क्या उनके पास कोई गम नहीं है? व्यक्ति वास्तव में खुश तो तभी हो पाता है जब वह अंदर से संतुष्ट हो..

बंगलादेसी भारत छोड़ो .........


जय बाबा बनारस।.......

दुश्मनी पाले दुसमन को अपने घर मैं पनाह दे....


.क्या आप दुश्मनी पाले  दुसमन को अपने घर मैं पनाह दे सकते है ........
.......बांग्लादेसी   भारत  छोड़ो.....

jai baba banaras....

Thursday, July 26, 2012

बांग्लादेसी भारत छोड़ो......

बांग्लादेसी   भारत  छोड़ो  , बांग्लादेसी   भारत  छोड़ो , बांग्लादेसी   भारत  छोड़ो , बांग्लादेसी   भारत  छोड़ो , बांग्लादेसी   भारत  छोड़ो , बांग्लादेसी   भारत  छोड़ो , बांग्लादेसी   भारत  छोड़ो , बांग्लादेसी   भारत  छोड़ो ,
बांग्लादेसी   भारत  छोड़ो ,बांग्लादेसी   भारत  छोड़ो ,बांग्लादेसी   भारत  छोड़ो ,बांग्लादेसी   भारत  छोड़ो, बांग्लादेसी   भारत  छोड़ो ,बांग्लादेसी   भारत  छोड़ो ,बांग्लादेसी   भारत  छोड़ो, बांग्लादेसी   भारत  छोड़ो ,

सरकार के उपर जब तक  हम और आप भारत देश की जनता जब तक यह आन्दोलन की सुरुआत नहीं करने की इच्छा अपने मन से बाहर  नहीं निकालेंगे तब तक ये बांग्लादेसी   भारत  छोड़ो का आन्दोलन सुरु नहीं हो सकता बांग्लादेसी   भारत  छोड़ो .....क्या आप दुश्मनी पाले  दुसमन को अपने घर मैं पनाह दे सकते है ........
.......बांग्लादेसी   भारत  छोड़ो.....

जय बाबा  बनारस।.......

Sunday, July 15, 2012

हिंदुओं में जातिवाद.....


त्यमेव जयते के सफल “हिंदुओं में जातिवाद” शो को बहुत सराहना मिली ....

चलिए अब मुझे भी सराहना दीजिए ... मैं भी “इस्लाम में जातिवाद” के कुछ कड़वे तथ्य आपके सामने रखने जा रहा हूँ ....

आमिर खान ने यह भयंकर जातिवादी मुद्दे अपने शो पर नहीं उठाये थे
...
१. जबसे इस्लाम मज़हब बना है तभी से “शिया और सुन्नी” मुस्लिम एक दूसरे की जान के दुश्मन हैं , यह लोग आपस में लड़ते-मरते रहते हैं ...!!

२. अहमदिया , सलमानी , शेख , क़ाज़ी , मुहम्मदिया , पठान आदि मुस्लिमों की जातियां हैं , और हंसी की बात !! यह एक ही अल्लाह को मानने वाले एक ही मस्जिद में नमाज़ नहीं पढते !!! सभी जातियों के लिए अलग अलग मस्जिदें होती हैं .!!

३. सउदी अरब , अरब अमीरात , ओमान , कतर आदि अन्य अरब राष्ट्रों के मुस्लिम
पाकिस्तान , भारत और बंगलादेशी मुस्लिमों से छुआछूत मानते हैं .

४. शेख अपने आपको सबसे उपर मानते हैं और वे किसी अन्य जाति में निकाह नहीं करते .

५. इंडोनेशिया में १०० वर्षों पूर्व अनेकों बौद्ध और हिंदू परिवर्तित होकर मुस्लिम बने थे , इसी कारण से सभी इस्लामिक राष्ट्र , इंडोनेशिया से घृणा की भावना रखते हैं ..

६. क़ाज़ी मुस्लिम भारतीय मुस्लिमों को मुस्लिम ही नहीं मानते ...क्यूंकि उनका मानना है के यह सब भी हिंदू धर्म से परिवर्तित हैं !!!

७. अफ्रीका महाद्वीप के सभी इस्लामिक राष्ट्र जैसे मोरोक्को , मिस्र , अल्जीरिया , निजेर , लीबिया , आदि राष्टों के मुस्लिमों को तुर्की के मुस्लिम सबसे निम्न मानते हैं .

८. सोमालिया जैसे गरीब इस्लामिक राष्ट्रों में अपने बुजुर्गों को जीवित समुद्र में बहाने की प्रथा चल रही है !!!

९. भारत के ही बोहरा मुस्लिम किसी भी मस्जिद में नहीं जाते वो मात्र मज़ारों पे जाते हैं ... उनका विश्वास सूफियों पे है .. अल्लाह पे नहीं !!

१० मुसलमान दो मुखय सामाजिक विभाग मानते हैं-
१. अशरफ अथवा शरु और
२. अज़लफ।

अशरफ से तात्पर्य है 'कुलीन' और

शेष अन्य मुसलमान जिनमें व्यावसायिक वर्ग और निचली जातियों के मुसलमान शामिल हैं उन्हें अज़लफ अर्थात्‌ नीचा अथवा निकृष्ट व्यक्ति माना जाता है। उन्हें कमीना अथवा इतर कमीन या रासिल, जो रिजाल का भ्रष्ट रूप है, 'बेकार' कहा जाता है।

कुछ स्थानों पर एक तीसरा वर्ग 'अरज़ल' भी है,

जिसमें आने वाले व्यक्ति सबसे नीच समझे जाते हैं।

उनके साथ कोई भी अन्य मुसलमान मिलेगा-जुलेगा नहीं और न उन्हें मस्जिद और सार्वजनिक कब्रिस्तानों में प्रवेश करने दिया जाता है।

१. 'अशरफ' अथवा उच्च वर्ग के मुसलमान (प) सैयद, (पप) शेख, (पपप) पठान, (पअ) मुगल, (अ) मलिक और (अप) मिर्ज़ा।

२. 'अज़लफ' अथवा निम्न वर्ग के मुसलमान

1. खेती करने वाले शेख और अन्य वे लोग जो मूलतः हिन्दू थे, किन्तु किसी बुद्धिजीवी वर्ग से सम्बन्धित नहीं हैं और जिन्हें अशरफ समुदाय, अर्थात्‌ पिराली और ठकराई आदि में प्रवेश नहीं मिला है।

2. दर्जी, जुलाहा, फकीर और रंगरेज।

3. बाढ़ी, भटियारा, चिक, चूड़ीहार, दाई, धावा, धुनिया, गड्‌डी, कलाल, कसाई, कुला, कुंजरा, लहेरी, माहीफरोश, मल्लाह, नालिया, निकारी।

4. अब्दाल, बाको, बेडिया, भाट, चंबा, डफाली, धोबी, हज्जाम, मुचो, नगारची, नट, पनवाड़िया, मदारिया, तुन्तिया।

३. 'अरजल' अथवा निकृष्ट वर्ग भानार, हलालखोदर, हिजड़ा, कसंबी, लालबेगी, मोगता, मेहतर।
क्या यह सच है।..

सत्यमेव जयते !!!!!!!!!!!!!!!!!!! 
जय बाबा बनारस।..

Thursday, July 12, 2012

सावन का महीना हो और झमा झम बारिस

सावन का महीना हो और झमा झम बारिस हो मन एक दम से मस्त हो जाता है 


एक दम मस्त मस्त मौसम है।

जय बाबा बनारस


Friday, June 29, 2012

गजब का आत्म विश्वास

 टॉल्सटॉय से उनके एक मित्र ने कहा- मैंने तुम्हारे पास एक योग्य व्यक्ति को भेजा था। उसके पास उसकी प्रतिभा के कई प्रमाणपत्र थे। लेकिन आश्चर्य है कि तुमने अपने सचिव के पद के लिए उसे नहीं चुना। मैंने सुना है कि तुमने उस पद के लिए जिस व्यक्ति को चुना है उसके पास ऐसा कोई प्रमाणपत्र नहीं था। आखिर उसमें ऐसा कौन सा गुण था कि तुमने मेरी बात की उपेक्षा कर दी? टॉल्सटॉय ने मुस्कराते हुए कहा- मैंने जिसे चुना है उसके पास अमूल्य प्रमाणपत्र हैं। मित्र ने आश्चर्य से पूछा-ऐसा क्या है उसके पास, जरा मैं भी सुनूं। टॉल्सटॉय ने कहा- उसने मेरे कमरे में आने से पहले इजाजत मांगी थी। अंदर आने से पहले उसने दरवाजों को इस तरह पकड़ कर धीरे-धीरे सटाया कि आवाज न हो। उसके कपड़े साधारण पर साफ-सुथरे थे। उसने बैठने से पहले कुर्सी साफ कर ली थी। उसमें गजब का आत्म विश्वास था। वह मेरे प्रश्नों के ठीक और संतुलित जवाब दे रहा था। मेरे प्रश्न समाप्त होने पर वह मेरी इजाजत लेकर चुपचाप उठा और चला गया। उसने किसी तरह की चापलूसी या चयन के लिए सिफारिश की कोशिश नहीं की। ये ऐसे प्रमाणपत्र थे जो बहुत कम व्यक्तियों के पास होते हैं। मेरा मानना है कि ऐसे गुणसंपन्न लोगों के पास यदि लिखित प्रमाणपत्र न भी हों, तो कोई बात नहीं। असली प्रमाणपत्र तो व्यवहार है। लिखित प्रमाणपत्र तो कोई भी हासिल कर सकता है। तुम ही बताओ, मैंने ठीक किया कि नहीं। यह सुनकर टॉल्सटॉय का मित्र निरुत्तर रह गया। 


जय बाबा बनारस।........

Thursday, June 7, 2012

श्रीमती रामदुलारी (76 वर्ष) ने आँखों देखा हाल हमको सुनाया।


शास्त्र कहते हैं कि भारत भूमि कर्म क्षेत्र है। शेष धरा भोग क्षेत्र है। अभी तक हमारे जीवन में प्रकृति के अनेक कार्य करते दिखाई पड़ते हैं। आदमी और औरत की परिभाषा ऎसी किसी देश में नहीं है, जैसी भारत में है। मर्द वह है जो भीतर जीता है। औरत बाहर जीती है। यही ब्रह्म और माया का रूप है। दोनों फिर भी अलग नहीं हो सकते। कई çस्त्रयाँ विधवा होकर जीती हैं। कुछ परित्यक्ता के रूप में। कुछ पति के साथ जला दी जाती थीं। इसके अलावा भी एक श्रेणी है, जहाँ पति के मरने की आशंका मात्र से स्त्री शरीर त्यागने की सोच लेती हैं। इसे ही जौहर कहते हैं। एक स्त्री का जौहर इतिहास में दर्ज हो गया और हजारों का जौहर राजनीति में खो गया।
इतिहास में जितनी चर्चा मीरा बाई की है, उतनी ही बड़ी चर्चा पदि्मनी की भी है। अलाउद्दीन खिलजी की सेना के चित्तौड़गढ़ किले में प्रवेश के साथ ही महारानी पदि्मनी आग में कूद पड़ी। उसके लिए संकल्प की पवित्रता अधिक महत्वपूर्ण थी।
अपने जम्मू एवं कश्मीर प्रवास में मेरा भी साक्षात् एक जीवित पदि्मनी से हुआ। वह स्थान भी देखा, जहाँ जौहर में उनका साथ पुरूषों ने भी दिया। यह दृश्य निश्चित तौर पर अटारी की ट्रेन से ज्यादा वीभत्स रहा होगा, क्योंकि जो कुछ भी कृत्य था, अपनों के जरिए किया हुआ था। शत्रु के छू लेने मात्र की कल्पना भी भयावह थी। क्षण भर में मर जाना और सोच-विचारकर संकल्प के साथ मरने में बड़ा अन्तर होता है।
मई 11 को जम्मू से चलकर राजोरी पहुँचा था। वहाँ सीधा बलिदान भवन गया। स्थानीय पार्षद भारत भूषण शर्मा हमारे साथ थे। बलिदान भवन स्थानीय तहसील का पिछवाड़े वाला हिस्सा है। सन् 1947 के युद्ध या बंटवारे की जंग में पाकिस्तानी कबायलियों के जत्थे पुंछ, राजौरी और जम्मू में आक्रमण कर रहे थे। इन क्षेत्रों में किसान ही थे। न उनके पास हथियार थे, न ही इस घटना के लिए कोई तैयार था। जैसे ही सूचना आई कि आक्रांता हमला करने आ रहे हैं, गाँव के हिन्दू स्त्री-पुरूष तहसील भवन में इकट्ठे हो गए। गाँव की रक्षा में तैनात महाराजा (जम्मू) हरिसिंह जी के प्रभारी अपने 25 लोगों के साथ भाग गए। आक्रांताओं की संख्या हजारों में थी। अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित भी थे। केन्द्र सरकार को भी महाराजा ने सेना भिजवाने की प्रार्थना की थी, जिसे ठुकरा दिया गया।
कबायलियों के आगे बढ़ने की सूचना, गाँवों में लूटमार, कत्लेआम और बलात्कार की बातें आग की तरह फैल रही थीं। राजौरी की तहसील में बन्द महिलाओं ने अपने पुरूष समुदाय के समक्ष प्रस्ताव रखा कि उन्हें जहर खाने की स्वीकृति दी जाए। बच पाने का दूसरा उपाय नजर नहीं आ रहा। आप लोगों को तो वे तुरन्त मार देंगे। हमें नहीं मारेंगे। पता नहीं किस-किस तरह की यातनाओं से गुजरना पड़े। इसलिए आक्रांताओं के हाथों नहीं पड़ना चाहतीं। इस प्रस्ताव को पुरूषों ने सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया। घटना के साक्षी दो पुरूष एवं एक महिला से हमारा साक्षात् बलिदान भवन में हुआ। उन्हीं में से श्रीमती रामदुलारी (76 वर्ष) ने आँखों देखा हाल हमको सुनाया।
दोनों ही पुरूष भी वहीं बैठे रहे। रामदुलारी ने बताया कि एक-एक करके पुरूषों ने अपनी बहू-बेटियों को जहर बांटना शुरू कर दिया। देखते ही देखते इसका प्रभाव भी सामने आने लगा। दुर्भाग्यवश ही कहें कि जहर चुकता हो गया। महिलाएं अभी बाकी थी। दीवानगी शत्रु से लड़ने की नहीं थी। शत्रु के दुर्व्यवहार से बचने की भी थी। भावनाएं चरम पर रही होंगी। çस्त्रयों का दूसरा प्रस्ताव आया कि जिन-जिन के पास भी बंदूकें हैं, हमें मार दें। बंदूकें कम थी। दो-दो महिलाओं को एक-एक बार में मारा गया। गोलियाँ भी जल्दी ही समाप्त हो गई। तब फिर महिलाओं ने प्रार्थना की कि जल्दी करें। अपने शस्त्रों से हमारा गला काट दें। क्या माहौल रहा होगा। प्रस्ताव स्वीकार हो गया।
श्रीमती रामदुलारी ने बताया कि पुरूषों ने अपनी कटारें, तलवारें निकाल ली, तहसील में ही बने एक कुएं के पास पहुंचे और एक-एक महिला का सिर काटकर कुएं में डालते गए। छोटे बच्चों को छोड़ दिया गया। स्वयं श्रीमती राम दुलारी बारह साल की थी। इनकी मां को इनका जीवित रहना मंजूर नहीं था। अपने ससुर की कटार से इनके सिर पर तीन वार किए। हमको इन्होंने सिर से पल्ला हटाकर वे घाव दिखाए। स्वयं तो बेहोश हो गई थी, कैसे बची, नहीं मालूम।
गाँव की आबादी लगभग चार हजार थी। आस-पास के गांवों से भी लोग भागकर राजौरी पहुंच गए थे। स्थानीय बाशिन्दे भी आक्रांताओं के साथ हो चुके थे। भीतर-बाहर मिलाकर लगभग बीस हजार लोग शहीद हो गए। यह सबसे बड़ा नरसंहार था। जिसे आज किसी भी रूप में याद नहीं किया जाता। शहीद दिवस पर भी इनके लिए दो शब्द नहीं कहे जाते। जो बच्चे बच गए थे, वे भी पाकिस्तानियों के कब्जे में ही रहे। यह दिवाली की काली रात बनकर रह गई। किन्तु श्रीमती रामदुलारी ने कहा कि आप राजस्थान से आए हैं, जहाँ रानी पदि्मनी का जौहर इतिहास में दर्ज है।
हमने भी उसी जौहर का अनुकरण करके दिखाया, जिस पर हम गर्व करते हैं। हमें खेद नहीं कि हमारी गाथा किसी ने सुनी या नहीं। केन्द्र सरकार ने घटना का उपयोग अपनी राजनीति करने में लिया। जब महाराजा ने लोगों को बचाने के लिए सेना भेजने की गुहार दोहराई, तब केन्द्र ने जम्मू सरकार के समक्ष विलय स्वीकार करने की शर्त रखी। महाराजा ने शर्त स्वीकार की और छह माह बाद सेना पहुंची। बैसाखी के दिन, छह माह की गुलामी काटकर, लोगों ने स्वतंत्रता मनाई। आज भी उन्हें शिकायत नहीं है कि सरकार उनकी ओर झांकती भी नहीं है। तहसील भवन को स्मारक बनाने की स्वीकृति भी नहीं दी। तब के बच्चे आज बूढ़े हैं। स्मृतियाँ ही अब इनकी धरोहर रह गई हैं।

(लेखक राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक हैं)

साभार-राजस्थान पत्रिका से