Saturday, January 29, 2011

लड़कियों के डर भी अजीब होते हैं

लड़कियों के डर भी अजीब होते हैं
भीड़ में हों तो लोगों का डर
अकेले में हों तो सुनसान राहों का डर
गर्मी में हों तो पसीने से भीगने का डर
हवा चले तो दुपट्टे के उड़ने का डर
कोई न देखे तो अपने चेहरे से डर
कोई देखे तो देखने वाले की आँखों से डर
बचपन हो तो माता-पिता का डर
किशोर हो तो भाइयों का डर
यौवन आये तो दुनिया वालो का डर
राह में कड़ी धुप हो तो,चेहरे के मुरझाने का डर
बारिश आ जाये तो उसमें भीग जाने का डर

वो डरती हैं और तब तक डरती हैं
जब तक उन्हें कोई जीवन साथी नहीं मिल जाता
और वही वो व्यक्ति होता हैं जिसे वो सबसे ज्यादा डराती है!

14 comments:

  1. ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है

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  2. वो डरती हैं और तब तक डरती हैं
    जब तक उन्हें कोई जीवन साथी नहीं मिल जाता
    ...........एकदम सही बात कही है..

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  3. बहुत सुंदर कविता जी, अभी बीबी से पुछता हुं कि वो मेरे से कितना डरती हे:) लेकिन कविता पढ कर सच मे आदमी सोचता हे, धन्यवाद

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  4. एक नया दृष्टिकोण, एकदम नया।

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  5. बहुत सुन्दर तरह से आपने इस डर को सामने लाया है !

    -------------

    बस एक और हो जाये ....

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  6. वाह
    भाई गजब की रचना ..तजुर्बेकार ही ऐसी रचना लिख सकता है ...बधाई

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  7. डर...
    डर
    डर
    डर
    डर
    डर
    डर

    अमा यार कुछ खुशी की बात करते

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  8. बहुत उम्दा विश्लेषण!!

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  9. kya khoob.....................

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  10. बहुत सटीक बाते कहीं है आपने. ........सुंदर प्रस्तुति.

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  11. बिल्कुल नई सोच के साथ लिखी गई रचना। इसका अंत लाजवाब है।

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  12. सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई!
    मंगल कामना के साथ.......साधुवाद!
    सद्भावी - डॉ० डंडा लखनवी

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  13. वाह,आप की सोच का जवाब नहीं !
    पढ़ कर आनन्द आ गया !

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