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Thursday, September 26, 2013

पिनक जा पिंकू

अफ्रीका में पहले ईसाई गये और बाद में इस्लाम वहां पर पहुंचा। चर्च और मस्जिद के बीच सर्वश्रेष्ठता व वर्चस्व की जंग ऐसी है जो कब समाप्त होगी यह कहना मुश्किल है। हां, यह सही है कि चर्च जहां राजनीतिक तौर पर लड़ रहा है और कथित सेवाभाव उसकी प्राथमिकता में शामिल हैं वही मस्जिद हिंसक राजनीति, आतंकवाद और घृणा की मानसिकता के हथकंडे से इस्लाम का राज स्थापित करना चाहता है। इस्लाम की हिंसा और मानवता को शर्मशार करने वाली मानसिकताओं से आज यूरोप और अमेरिका खुद हलकान है। जब इस्लाम का दुनिया से सफाया होगा तभी दुनिया में शांति आयेगी और मानवता की रक्षा होगी।
भारत देश मैं पहले मुसलमान आये उसके बाद  ईसाई आये in दोनों का मकसद एक ही है कि भारत देश को मुस्लिम देश बना दो या फिर इस डेढ़ का ईसाईं करण कर दे अब भारत देश तो भारत देश है जब तक शांत रहता है शांत रहता है अगर एक बार यहाँ के हिन्दू पिनक गए तब न तो इस देश मैं मुसलमान रहेगा न ही ईसाईं ही रहेगा ...अब हिन्दू कब पिन्केगा यह कोई नहीं जनता है आजकल तो इस देश पर एक कठपुतली का शासन चल रहा है और कठपुतली का खेल दिन और रात नहीं चलता है

जय बाबा बनारस....

Wednesday, July 24, 2013

लाभकारी संस्था

मुसलमानों मैं अपने उपर कण्ट्रोल करने की आदत नहीं है नहीं मानते तो यह आज की खबर इस की पुस्ती करती है पाकिस्तान में टीवी चैनलों पर कंडोम के एक भड़काऊ विज्ञापन के प्रसारण पर पाबंदी लगा दी गई है. पाबंदी लगाते हुए कहा गया कि इस तरह की ‘अनैतिक’ बातों को रमजान के पवित्र महीने के दौरान प्रसारित नहीं किया जाना चाहिए.
यह विज्ञापन अदाकारा मथीरा पर फिल्माया गया है. पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नियामक प्राधिकरण (पीईएमआरए) ने इस 50 सेकंड के विज्ञापन के ‘अश्लील’ होने के बारे में कई शिकायतें मिलने के बाद इसपर पाबंदी लगा दी. अथॉरिटी के प्रवक्ता फक्र मुगल ने यह जानकारी दी.
उन्होंने मीडिया से कहा, ‘पाकिस्तानी चैनलों पर इस तरह के अनैतिक विज्ञापन का प्रसारण और वह भी रमजान के महीने में, गंभीर कार्रवाई की मांग करता है.’
मुगल ने बताया, ‘टीवी चैनलों ने कंडोम के इस विज्ञापन को प्रसारित नहीं करने का फैसला किया है, क्योंकि यह बहुत अनैतिक है.’
गौरतलब है कि पाकिस्तान में इस कंडोम की मार्केटिंग अमेरिका की एक गैर लाभकारी संस्था करती है, जो परिवार नियोजन और एड्स की रोकथाम के लिए काम करती है.

Thursday, July 18, 2013

खून का रंग सबका एक होता है

हिन्दू लड़की राधा एक मुस्लिम लड़के से प्रेम करती हैं ,, माँ बाप ने बहुत समझाया की बेटी निबाह नहीं पायेगी ,,पर राधा ने कहा कि"क्या फर्क है हिन्दू मुसलमान में" उसके खून का रंग भी लाल मेरे खून का रंग भी लाल .... घर वालों व् समाज के प्रबल विरोध के बाद भी मुस्लिम लड़के से प्रेम विवाह रचाती है ,,,शादी के बाद सब कुछ बहुतअच्छा चल रहा था
हिन्दू लड़की का नाम भी बदला नहीं गया
सास ससुर बहुत अच्छे निकले ..बहुत प्यार करते थे ...ससुराल में सबकी लाड़ली ..... लड़कीके माँ बाप उससे संबंध तोड़ चुके थे ...जब तब राधा अपने माँ बाप को याद करती और खबर भिजवाती थी कि मुस्लिम परिवार में मैं बहुत खुश हूँ कोई दिक्कत नहीं है
फिर राधा के दो बच्चे हुए एक बेटा एक बेटी ...दो प्यारे बच्चों की परवरिश अच्छे से हुई
बेटी बड़ी हुई शादी के लिए लड़का देखने की बात हुई
तो पति और सास ससुर की बात सुन कर सन्न रह गयी
पति और सास ससुर का निर्णय था कि बिटिया की शादी उसकी बुआ के बेटे से तय की जाएगी.....
राधा ने विरोध किया कि बुआ का लड़का भाई होता है ,,पर दो टूक कहा गया वो हिन्दुओं में है मुस्लिम में नहीं
राधा ने बेटी को कहा की बेटी तू विरोध कर इस बात का ,,,तो बेटी बोली माँ फूफी के लड़के जावेद से मैं प्यार करती हूँ
राधा ने एक तमाचा मारा अपनी बेटी के मुंहपर और बोली,,,,नालायक वो तेरा भाई है तेरी बुआ का बेटा है,,,,बिटिया बोली वो आपके हिन्दू धर्म में होता है और मैं मुस्लिम हूँ
अब राधा के पैरों के नीचे की ज़मीन निकल चुकी थी ,,,बाप की बात याद आई बेटा निबाह नहीं पायेगी .....
उसी रात में राधा ने आत्म ह्त्या कर ली
क्यूंकि नमाज पढ़ना कबूल था,,बुर्का कबूल था ,,ईद .. रमजान कबूल था
पर अपनी बेटी की शादी उसकी बुआ के लड़के से कबूल नहीं कर पायी
बाप की बात आखिरी पल में भी याद आ रही थी कि बेटी खून का रंग सबका एक होता है पर सोच सभी अलग अलग होती है 


जय बाबा बनारस ....

Thursday, March 21, 2013

द्रोह वह करता है जो अपना होता है,

मुसलमान को देशद्रोही कहना उसको सम्मान प्रदान करना है,वह बाबर हो या सलमान,

बाबर एक लुटेरा थ। और सलमान कौन है सब जानते है अरे वही जो दुश्मन देश के राजा को बुला कर ...दावत देता है

द्रोह वह करता है जो अपना होता है,

मुस्लमान कभी अपना होता ही नहीं तो वह क्या द्रोह करेगा,

जय बाबा बनारस ....

Tuesday, December 21, 2010

बनारस का लंगड़ा और विशुद्ध शाकाहारी मुसलमान

बनारस एक ऐसा नगर है, जहाँ जाकर मनुष्य अद्भुत आध्यात्मिक भावना से परिपूरित हो जाता है और बनारस की सड़कों तथा गलियों में पैदल घूमने-विचरने में असीम आनंद का अनुभव करता है। एक समय की बात है कि उर्दू के प्रसिद्ध शायर अकबर इलाहाबादी एक बार बनारस गये और अपने एक मुसलमान मित्र के यहाँ ठहरे। उनके मित्र बनारस के उन मुसलमानों में थे, जो विशुद्ध शाकाहारी थे। यहां तक कि प्याज और लहसुन भी उनके घर में नहीं आता था। ऐसे मुसलमान काफी संख्या में आज भी बनारस में हैं, जिनके यहां विशुद्ध शाकाहारी भोजन ही बनता है। अधिकांशत ये शिया हैं।
अकबर इलाहाबादी को बनारस इतना ज्यादा पसंद आया कि वह काफी दिनों तक वहां रुके रहे। एक दिन हिन्दी के कुछ साहित्यकार मित्र उनसे मिलने आये। काफी देर तक साहित्य चर्चा होती रही। उनमें से एक सज्जन ने पूछा कि जनाब को बनारस कैसा लगा? इसके जवाब में अकबर ने एक पुस्तक उठायी और उसके भीतर से एक पर्ची निकाल कर उनके हाथ में दे दी। इस पर उनका लिखा हुआ एक शेर था, जो इस प्रकार है -
शहर एक बनारस है।जिसका हर खाक पारस है।।
उस शेर को प्रशनकर्ता ने जोर से पढ़कर सुनाया, जिसके सुनते ही हिन्दू-मुसलमान साहित्यकारों की वाह-वाह की ध्वनि गूंज उठी। बनारस की भूमि में एक खास आकर्षण है, जिसने आज से सदियों पहले ईरान से आये हुए, हाफिज आदि फारसी के उच्चकोटि के शायरों तक को प्रभावित किया था।
वैसे तो बनारस आज भी बहुत-सी चीजों के लिए मशहूर है, पर जिस चीज के लिए वह सारे उत्तर भारत में प्रसिद्ध है, वह है बनारस का लंगड़ा आम, जिसे देखते ही लोगों के मुंह में पानी आ जाता है और वे उसे किसी भी कीमत पर खरीदने को तैयार हो जाते हैं। बनारस के लंगड़ा आम की जन्म-कथा भी रोचक है।
लगभग ढाई सौ वर्ष पहले की घटना है। कहते हैं, बनारस के एक छोटे-से शिव-मंदिर में, जिसमें लगभग एक एकड़ जमीन थी, जो चाहर दीवारियों से घिरी हुई थी, एक साधु आया और मंदिर के पुजारी से वहां कुछ दिन ठहरने की आज्ञा माँगी। पुजारी ने कहा, ``मंदिर परिसर में कई कक्ष हैं, किसी में भी ठहर जाएँ।'' साधु ने एक कमरे में धूनी रमा दी।
साधु के पास आम के दो छोटे-छोटे पौधे थे, जो उसने मंदिर के पीछे अपने हाथों से रोप दिये। सुबह उठते ही वह सर्वप्रथम उनको पानी दिया करता, जैसा कि कण्व त्र+षि के आश्रम में रहते हुए कालिदास की शकुंतला किया करती थी। साधु ने बड़े मनोयोग के साथ उन पौधों की देखरेख की। वह चार साल तक वहां ठहरा। इन चार बरसों में पेड़ काफी बड़े हो गये। चौथे वर्ष आम की मंजरियाँ भी निकल आयीं, जिन्हें तोड़कर उस साधु ने भगवान शंकर पर चढ़ायीं। फिर वह पुजारी से बोला, ``मेरा काम पूरा हो गया। मैं तो रमता जोगी हूं। कल सुबह ही बनारस छोड़ दूंगा। तुम इन पौधों की देखरेख करना और इनमें फल लगें, तो उन्हें कई भागों में काटकर भगवान शंकर पर चढ़ा देना, फिर प्रसाद के रूप में भक्तों में बांट देना, लेकिन भूलकर भी समूचा आम किसी को मत देना। किसी को न तो वृक्ष की कलम लगाने देना और न ही गुठली देना। गुठलियों को जला डालना, वरना लोग उसे रोपकर पौधे बना लेंगे।'' और वह साधु बनारस से चला गया।
मंदिर के पुजारी ने बड़े चाव से उन पौधों की देखरेख की। कुछ समय पश्चात पौधे पूरे वृक्ष बन गये। हर साल उनमें काफी फल लगने लगे। पुजारी ने वैसा ही किया, जैसा कि साधु ने कहा था। जिन लोगों ने उस आम को प्रसाद के रूप में खाया, वे लोग उस आम के स्वाद के दीवाने हो गये। लोगों ने बार-बार पुजारी से पूरा आम देने की याचना की, ताकि उसकी गुठली लाकर वे उसका पौधा बना सकें, पर पुजारी ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया।
इस आम की चर्चा काशी नरेश के कानों तक पहुँची और वह एक दिन स्वयं वृक्षों को देखने राम-नगर से मंदिर में आ पहुंचे। उन्होंने श्रद्धापूर्वक भगवान शिव की पूजा की और वृक्षों का निरीक्षण किया। फिर पुजारी के समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि इनकी कलमें लगाने की अनुमति प्रधान-माली को दे दें। पुजारी ने कहा, ``आपकी आज्ञा को मैं भला कैसे टाल सकता हूँ। मैं आज ही सांध्य-पूजा के समय शंकरजी से प्रार्थना करूंगा और उनका संकेत पाकर स्वयं कल महल में आकर सरकार का दर्शन करूंगा और मंदिर का प्रसाद भी लेता आऊँगा।''
इसी रात भगवान शंकर ने स्वप्न दिया, ``काशी नरेश के अनुरोध को मेरी आज्ञा मानकर वृक्षों में कलम लगवाने दें। जितनी भी कलमें वह चाहें, लगवा लें। तुम इसमें रुकावट मत डालना। वे काशीराज हैं और एक प्रकार से इस नगर में हमारे प्रतिनिधि स्वरूप हैं।'' दूसरे दिन प्रातकाल की पूजा समाप्त कर प्रसाद रूप में आम के टोकरे लेकर पुजारी काशी नरेश के पास पहुँचा। राजा ने प्रसाद को तत्काल ग्रहण किया और उसमें एक अलौकिक स्वाद पाया।
काशी नरेश के प्रधान-माली ने जाकर आम के वृक्षों में कई कलमें लगायीं, जिनमें वर्षाकाल के बाद काफी जड़ें निकली हुई पायी गयीं। कलमों को काटकर महाराज के पास लाया गया और उनके आदेश पर उन्हें महल के परिसर में रोप दिया गया। कुछ ही वर्षों में वे वृक्ष बनकर फल देने लगे। कलम द्वारा अनेक वृक्ष पैदा किये गये। महल के बाहर उनका एक छोटा-सा बाग बनवा दिया गया। कालांतर में इनसे अन्य वृक्ष उत्पन्न हुए और इस तरह रामनगर में लंगड़े आम के अनेकानेक बड़े-बड़े बाग बन गये। आज भी जिन्हें बनारस के आसपास या शहर के खुले स्थानों में जाने का मौका मिला होगा, उन्हें लंगड़े आम के वृक्षों और बागों की भरमार नजर आयी होगी। हिन्दू विश्वविद्यालय के विस्तृत विशाल प्रांगण में लंगड़े आम के सैकड़ों पेड़ हैं।
अब आप यह जानना चाहेंगे कि इसका नाम लंगड़ा क्यों पड़ा? बात यह थी कि साधु द्वारा लगाये हुए पौधों की समुचित देखरेख जिस पुजारी ने की थी, वह लंगड़ा था और इसीलिए इन वृक्षों से पैदा हुए आम का नाम लंगड़ा पड़ गया, और आज तक इस जाति के आम सारे भारत में इसी नाम से प्रसिद्ध हैं।